@शब्द दूत ब्यूरो (11 मई 2026)
दुनिया में कई ऐसे देश हैं जहाँ विशेष परिस्थितियों में सरकारों ने नागरिकों के लिए पेट्रोल और डीजल खरीदने की सीमा तय की है। यह आमतौर पर आर्थिक संकट, युद्ध, तेल की कमी या आपूर्ति बाधित होने जैसी स्थितियों में किया जाता है। उदाहरण के तौर पर श्री लंका में 2022 के आर्थिक संकट के दौरान सरकार ने QR कोड आधारित प्रणाली लागू कर दी थी, जिसके तहत हर वाहन के लिए प्रति सप्ताह निश्चित मात्रा में ही ईंधन दिया जाता था। इसी तरह वेनेजुएला में, जहाँ दुनिया के बड़े तेल भंडार हैं, आर्थिक अव्यवस्था के कारण नागरिकों के लिए सब्सिडी वाले पेट्रोल की लिमिट तय की गई और अतिरिक्त पेट्रोल महंगे दामों पर उपलब्ध कराया गया।
Iran में लंबे समय से फ्यूल कार्ड सिस्टम लागू है, जिसमें हर वाहन मालिक को हर महीने सीमित मात्रा में सस्ता पेट्रोल मिलता है, जबकि उससे अधिक खरीदने पर ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है। क्यूबा में भी आर्थिक प्रतिबंधों और ईंधन की कमी के चलते सरकार समय-समय पर पेट्रोल-डीजल की राशनिंग लागू करती रही है और जरूरी सेवाओं को प्राथमिकता दी जाती है। नाइजीरिया में भी हाल के वर्षों में ईंधन संकट और सब्सिडी हटाने के बाद कई क्षेत्रों में सीमित आपूर्ति के कारण खरीद पर नियंत्रण देखने को मिला।
वहीं नॉर्थ कोरिया जैसे देश में सरकार का ईंधन पर पूर्ण नियंत्रण है और आम नागरिकों के लिए पेट्रोल-डीजल की उपलब्धता पहले से ही सीमित रहती है। विकसित देशों में सामान्यतः ऐसी व्यवस्था नहीं होती, लेकिन संकट के समय अस्थायी रूप से लागू की जाती है। जैसे यूनाइटेड किंगडम में 2021 के ईंधन संकट के दौरान कई पेट्रोल पंपों ने प्रति ग्राहक खरीद की सीमा तय कर दी थी। यूनाइटेड स्टेटस में भी 1973 ऑइल क्राइसिस के समय पेट्रोल की राशनिंग लागू की गई थी, जिसमें वाहन नंबर के आधार पर ईंधन दिया जाता था।
इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि पेट्रोल-डीजल की खरीद पर लिमिट लगाना कोई स्थायी नीति नहीं बल्कि संकट से निपटने का उपाय होता है। जब भी किसी देश में विदेशी मुद्रा की कमी, तेल आपूर्ति में बाधा, युद्ध जैसी स्थिति या आर्थिक अस्थिरता पैदा होती है, तब सरकारें ईंधन की खपत नियंत्रित करने के लिए इस तरह के कदम उठाती हैं। इंडिया में फिलहाल ऐसी कोई व्यवस्था लागू नहीं है, लेकिन आपातकालीन परिस्थितियों में भविष्य में ऐसा निर्णय लिया जा सकता है।
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