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हिंदी पत्रकारिता दिवस और पत्रकारिता की बदलती परिभाषाएं, पत्रकारिता दिवस सीरीज – 1

@विनोद भगत

30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाते समय हमें न केवल अतीत के उस गौरवशाली क्षण को स्मरण करना चाहिए जब पंडित युगल किशोर शुक्ल ने ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन किया था, बल्कि यह भी विचार करना चाहिए कि आज की पत्रकारिता उस आदर्श से कितनी दूर खड़ी है।

एक समय था जब पत्रकारिता एक मिशन थी — सत्य की खोज, जनहित का प्रतिनिधित्व, और समाज के हाशिए पर खड़े व्यक्ति की आवाज़ बनने का ज़रिया। संपादकीय पृष्ठ पर छपने वाले लेख जनमत को दिशा देते थे। संवाददाता गांवों की गलियों से लेकर संसद तक की ख़बरें जिम्मेदारी के साथ लाते थे। उस युग में पत्रकार खुद भूखे रह जाते थे, लेकिन कलम को बिकने नहीं देते थे।

लेकिन आज की स्थिति भिन्न है। आज पत्रकारिता व्यवसाय बन गई है, एक ऐसा ‘इंडस्ट्री’ जहां TRP, व्यूज और स्पॉन्सरशिप की होड़ ने सत्य को हाशिए पर धकेल दिया है। न्यूज़ चैनलों की बहसें एक तमाशा बन चुकी हैं — जहां शोर है, लेकिन संवाद नहीं। सोशल मीडिया की तेज़ी में तथ्यों की जगह अफवाहों और सनसनीखेज शीर्षकों ने ले ली है।

मीडिया हाउस कॉर्पोरेट और राजनीतिक दबावों के आगे झुकने लगे हैं। पत्रकारों पर एफआईआर दर्ज होती है, या उन्हें ‘पक्षधर’ करार देकर अलग कर दिया जाता है। कभी जो पत्रकार सत्ता की आँख में आँख डाल कर सवाल करता था, आज वह केवल प्रवक्ता की तरह बर्ताव करता दिखता है।

यह भी नहीं कहा जा सकता कि पूरे परिदृश्य में अंधकार ही है। कुछ पत्रकार अब भी जोखिम उठाकर सच को सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं। डिजिटल माध्यमों पर स्वतंत्र पत्रकारिता का एक नया स्वरूप उभर रहा है, जो आशा की किरण है।

लेकिन मूल प्रश्न यह है:
क्या पत्रकारिता आज भी जनता की आवाज़ है?
क्या खबरें अब भी समाज में बदलाव लाने का माध्यम हैं?
या फिर खबरें अब उत्पाद बन चुकी हैं — जिसे परोसा जाता है, खरीदा जाता है, और सत्ता की मर्ज़ी से फैलाया जाता है?

पुरानी और नई पत्रकारिता में यही मूल अंतर है — एक ने सवाल पूछे, दूसरी ने जवाब बेचने शुरू कर दिए।

हिंदी पत्रकारिता दिवस पर हमें यह आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या हम उस परंपरा के उत्तराधिकारी हैं, जिसने अंग्रेज़ी हुकूमत की नींव हिला दी थी? या हम मात्र उस सिस्टम का हिस्सा हैं, जो जनता को सूचनाओं की आड़ में भ्रमित कर रहा है?

हमें पत्रकारिता को फिर से जनहित का औज़ार बनाना होगा — तभी यह दिवस एक सच्चा उत्सव बन सकेगा, वरना यह केवल एक औपचारिक तिथि बनकर रह जाएगा।

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