@विनोद भगत
देहरादून के एक परिवार के 7 सदस्यों ने कर्ज के बोझ तले दबकर हरियाणा में आत्महत्या कर ली। और मीडिया में एक ब्रेकिंग न्यूज आने लगी। यह समाचार सुनते ही पूरे देश की आत्मा जैसे कांप उठी। आंखों के सामने एक ही पल में सात अर्थियां उठती दिखीं, जिनके पीछे न रोने वाला कोई बचा और न जीने की कोई वजह। क्या यह केवल एक ब्रेकिंग न्यूज है? नहीं। पर क्या यह केवल एक समाचार है या यह मानवता के माथे पर एक शर्मनाक धब्बा है। यह हमारे सामाजिक तंत्र की वह असफलता है, जिसे हम रोज़ नजरअंदाज करते आ रहे हैं।
हर आत्महत्या केवल एक जीवन का अंत नहीं होती, वह समाज की उस संरचना पर सवाल है जो व्यक्ति को जीने की बजाय मरने के लिए मजबूर कर देती है। जब एक पूरा परिवार मौत को गले लगा लेता है, तो यह केवल आर्थिक असफलता नहीं होती, यह हमारे सामाजिक, आर्थिक और नैतिक ढांचे की असफलता होती है। किसी पिता का अपनी पत्नी और बच्चों के साथ आत्महत्या कर लेना इस बात का प्रमाण है कि उसके पास अब कोई रास्ता नहीं बचा था। क्या हमने उसे वह रास्ता दिखाने की कोशिश की?
हमारा समाज, जो चंद करोड़पति उद्योगपतियों के अरबों के लोन माफ कर देता है, वहीं एक साधारण परिवार के कुछ लाख के कर्ज को माफ नहीं कर पाता। यह कैसा न्याय है? यह कैसा लोकतंत्र है, जिसमें पूंजी की सत्ता इंसानियत से ऊपर बैठी है? यह आत्महत्याएं केवल देहरादून में नहीं होतीं, हर राज्य में, हर महीने, कहीं न कहीं कोई न कोई गरीब परिवार इसी तरह बिखरता है। पर हम इसे एक सामान्य समाचार मानकर अगले दिन भूल जाते हैं।
समाचार चैनलों पर यह खबर कुछ घंटों की सुर्खी बनती है, फिर किसी फिल्मी सितारे की शादी, किसी क्रिकेट मैच की चर्चा या किसी मंत्री के बयान के आगे दब जाती है। पर उस परिवार के रिश्तेदारों, पड़ोसियों और समाज के संवेदनशील लोगों के मन में यह घटना एक लंबे समय तक टीस बनकर रहती है। उस पिता की आंखों में शायद आखिरी क्षणों में यह सवाल रहा होगा – क्या कोई रास्ता बचा है? क्या कोई हाथ मेरी मदद को बढ़ेगा? पर अफसोस, वह हाथ नहीं आया।
हमारे समाज की संवेदना इतनी कमजोर क्यों हो गई है? क्यों किसी की बेबसी हमें विचलित नहीं करती? क्यों हम ‘सिस्टम’ को गालियां देकर अपने कर्तव्य से मुक्त हो जाते हैं? यह लेख उस परिवार की आत्मा की चीख है, जो अब इस दुनिया में नहीं है, पर उनकी मौत हमें झकझोर कर यह पूछ रही है कि हम किस ओर जा रहे हैं?
सरकारी योजनाएं, कर्जमाफी घोषणाएं, बीमा सुरक्षा, सब कुछ कागजों तक सीमित है। ज़मीन पर जब एक गरीब अपनी दुकान, नौकरी या फसल खो बैठता है, तो बैंक की किश्तें उसके लिए फांसी का फंदा बन जाती हैं। समाज के तथाकथित संभ्रांत वर्ग को यह पीड़ा नहीं दिखती, क्योंकि उनके घरों में ग़रीबी कभी दाखिल नहीं होती।
हमें एक ऐसा समाज बनाना होगा, जहां आत्महत्या अंतिम विकल्प न रह जाए। हमें मदद की संस्कृति विकसित करनी होगी, जहां कोई कर्जदार अकेला न रह जाए। कोई मां अपने बच्चों को ज़हर न दे, कोई पिता छत से न कूदे, कोई बहन राखी के दिन खुद को फांसी न लगाए। हम मानव हैं, और मानवता की सबसे बड़ी पहचान उसकी संवेदना होती है।
यह घटना हमें एक बार फिर यह सोचने को मजबूर करती है कि विकास का मतलब क्या है? क्या केवल ऊंची इमारतें और बड़ी गाड़ियाँ विकास का प्रतीक हैं, या एक ऐसा समाज जहां हर कोई बिना डर के, बिना कर्ज के, इज्ज़त से जी सके?
देहरादून के परिवार की यह खबर, एक समाचार नहीं, एक पीड़ा है। एक चेतावनी है। एक प्रार्थना है – कि अगली बार किसी परिवार को इस राह पर न जाना पड़े। आइए, हम मिलकर वह समाज बनाएं, जहां जीना सस्ता हो, और मरना मजबूरी न बने।
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