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भारत की अखंडता बनाम ‘बाहरी’ विरोध: एक विडंबनात्मक द्वंद्व, एक गंभीर विश्लेषण

@विनोद भगत

भारत एक ऐसा देश है जो विविधताओं में एकता की मिसाल के रूप में विश्वपटल पर जाना जाता है। संविधान की प्रस्तावना में “भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य” के रूप में परिभाषित किया गया है, जो नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और अवसरों की गारंटी देता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न राज्यों में “बाहरी” शब्द को लेकर जो विवाद खड़े हुए हैं, वे न केवल भारत की संवैधानिक भावना पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं, बल्कि देश की अखंडता के विचार को भी चुनौती देते हैं।

5 अगस्त 2019 को भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया। इस कदम को “राष्ट्र की एकता और अखंडता” के नाम पर व्यापक समर्थन मिला। एक बड़ा वर्ग इसे इस दृष्टिकोण से देखता है कि अब कोई भी भारतीय नागरिक जम्मू-कश्मीर में संपत्ति खरीद सकता है, निवास कर सकता है और रोजगार प्राप्त कर सकता है – ठीक वैसे ही जैसे किसी अन्य राज्य में।

इस कदम को कई राज्यों ने खुले समर्थन के साथ स्वीकार किया। विशेषकर उत्तर भारत के राज्यों ने इसे “एक राष्ट्र – एक कानून” की दिशा में बड़ा कदम बताया।

विडंबना तब और गहरी हो जाती है जब वही राज्य जो अनुच्छेद 370 के खात्मे का स्वागत करते हैं, अपने राज्य में बाहरी नागरिकों के निवास, व्यवसाय या नौकरी करने पर विरोध करने लगते हैं। उत्तराखंड इसका ताजा उदाहरण है। हाल के महीनों में यहां “भूमि जिहाद” जैसे शब्दों के बहाने बाहरी लोगों, विशेषकर मुस्लिम समुदाय, पर निशाना साधा जा रहा है। कई गांवों और कस्बों में बाहरी लोगों के लिए किराये पर मकान देने से मना किया जा रहा है। और अन्य राज्यों में तो धर्म से अलग भाषाई आधार पर विरोध किया जा रहा है। हालांकि हवा केवल मुस्लिम के मामलों को दी जा रही है। जिसके मूल में राजनीतिक कारण हो सकते हैं।

राज्य में ‘उत्तराखंडियत’ की रक्षा के नाम पर भूमि कानूनों में संशोधन की मांग तेज हो रही है, जिससे यह आशंका और बढ़ गई है कि यह भावनाएं धीरे-धीरे एक प्रकार के असंवैधानिक क्षेत्रीयतावाद में बदल रही हैं।

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) और जनगणना के आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत में आंतरिक प्रवास (internal migration) एक स्वाभाविक सामाजिक-आर्थिक प्रक्रिया है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में कुल जनसंख्या का लगभग 37% हिस्सा आंतरिक प्रवासी है। उत्तराखंड में प्रवासियों की संख्या लगभग 7.6 लाख है, जिनमें से अधिकांश प्रवासी उत्तर प्रदेश, बिहार, और नेपाल से आते हैं।

उत्तराखंड में कुल कार्यशील जनसंख्या का लगभग 12-15% हिस्सा बाहरी राज्यों से आए मजदूरों और श्रमिकों का है। ये लोग मुख्यतः निर्माण, होटल, कृषि और घरेलू सेवा क्षेत्रों में कार्यरत हैं। ऐसे में उनका विरोध, न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए भी घातक हो सकता है।

कोई भी समाज बिना अपनी क्षेत्रीय पहचान के नहीं रह सकता। मराठी अस्मिता, तमिल संस्कृति, पंजाबी पगड़ी, बंगाली बुद्धिवाद – ये सब भारत की विविधता को समृद्ध करते हैं। लेकिन जब क्षेत्रीय अस्मिता, राष्ट्रीय एकता के विपरीत खड़ी होने लगे – तब वह खतरनाक रूप ले लेती है।

1970-80 के दशक में मुंबई में शिवसेना द्वारा ‘भैय्यों’ (उत्तर भारतीयों) के खिलाफ आंदोलन,
2010 के बाद असम में बांग्लादेशी मूल के लोगों पर हमले,
हाल ही में मणिपुर, नगालैंड, और लद्दाख में भी बाहरी लोगों के खिलाफ असंतोष –
ये सभी उदाहरण क्षेत्रीय पहचान के नाम पर संविधान की मूल भावना के विरुद्ध जाते हैं।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(e) और (g) प्रत्येक नागरिक को भारत के किसी भी भाग में निवास करने और किसी भी पेशे को अपनाने का मौलिक अधिकार देता है। कोई भी राज्य किसी भारतीय नागरिक को केवल ‘बाहरी’ कहकर उसके अधिकारों का हनन नहीं कर सकता। हां, कुछ विशेष राज्य जैसे नागालैंड, मिजोरम और हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में अनुच्छेद 371 के अंतर्गत विशेष सुरक्षा प्रावधान हैं, लेकिन वे भी पूरी तरह नागरिकता से नहीं, सांस्कृतिक संरक्षा से जुड़े हैं।

यदि उत्तराखंडवासी यह मानते हैं कि उनके संसाधन सीमित हैं और बाहरी लोग उन्हें छीन रहे हैं, तो इसका समाधान संविधान के भीतर रहकर निकाला जा सकता है। भूमि खरीद की सीमा, पर्यावरणीय मानकों की सुरक्षा, स्थानीय निवासियों को आरक्षण – ये सभी विधिक उपाय हैं। और सरकार इस ओर कदम उठा चुकी है और आगे भी नीतियों पर मंथन हो रहा है। लेकिन ‘बाहरी’ शब्द का राजनीतिक और सांप्रदायिक रंग देना, न केवल भारत की सामाजिक संरचना के लिए हानिकारक है, बल्कि वही लोग जो कश्मीर में भारत की एकता की बात करते हैं, वे अपने व्यवहार से उस एकता को ही खंडित करते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा योगदान पर्यटकों और श्रद्धालुओं का है जो बाहर से ही आते हैं

भारत की एकता केवल भूगोल या सीमाओं से तय नहीं होती, यह तय होती है – भावना से, संविधान से, और साझा नागरिकता से। कोई भी राज्य यदि बाहरी के नाम पर असहमति को बढ़ावा देता है, तो वह भारत की उस आत्मा को चोट पहुंचाता है, जिसे संविधान ने गढ़ा है।

जो लोग कश्मीर में “एक देश – एक कानून” का समर्थन करते हैं, वे उत्तराखंड, असम, महाराष्ट्र या अन्य किसी भी राज्य में क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर दोहरा व्यवहार नहीं कर सकते। भारतीय नागरिक का अधिकार, भारत के हर कोने में समान होना चाहिए – यही भारत की अखंडता की सच्ची परिभाषा है।

डिस्क्लेमर – यह लेखक के निजी विचार हैं। सहमति या असहमति पाठकों के अपने विवेक पर है।

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