@विनोद भगत
मदर्स डे के अगले दिन
मई की गर्म सुबह थी। सूरज की किरणें खिड़की से झांक रही थीं, और बाहर कोयल की आवाज गूंज रही थी। पर इस सबके बीच एक मां की निगाहें अपने बेटे के दरवाजे पर टिकी थीं। वह हर सुबह की तरह आज भी जल्दी उठ चुकी थी। पर आज कुछ अलग था। उसका मन बेचैन था।
“बेटा, आज नहीं आया सबेरे-सबेरे?” मां ने रसोई में काम कर रही बहू से पूछा। बहू ने कुछ सुना, पर जवाब नहीं दिया। मां कुछ पल ठिठकी रही। फिर गहरी सांस लेकर अपने कमरे में चली गई। उसने धीरे से चश्मा उठाया और बेटे के कमरे की ओर चल पड़ी।
कमरे का दरवाज़ा थोड़ा खुला था। भीतर बेटा गहरी नींद में सोया हुआ था। मां ने धीरे से पुकारा, “बेटा… बेटा उठो।” बेटा करवट बदलते हुए झल्ला गया, “मां! सुबह-सुबह क्यों जगा रही हो? कुछ काम था तो बाद में कहती, नींद खराब कर दी।” मां स्तब्ध रह गई। कल का दिन उसे याद आया जब यही बेटा और बहू उसके सामने चरण स्पर्श कर रहे थे।
वह दृश्य अब भी उसकी आंखों के सामने घूम रहा था। कल सुबह बेटे और बहू ने हाथ में मोबाइल लेकर उसके कमरे में प्रवेश किया था। बेटा मुस्कुरा रहा था, बहू ने मिठाई का डिब्बा पकड़ा हुआ था।
“मां! हैप्पी मदर्स डे,” दोनों ने एक साथ कहा और मां के पैर छू लिए। कैमरे की फ्लैश चमकी, तस्वीरें ली गईं। मां के चेहरे पर मुस्कान थी, आंखों में आंसू। भावनाओं की तरलता में उसने उन्हें ढेरों आशीर्वाद दे दिए।
पर आज वह आशीर्वाद जैसे अपने ही अर्थ खो चुका था। मां बुझे मन से अपने कमरे में लौट आई थी, पर उसके मन में उथल-पुथल थी। क्या सिर्फ तस्वीरों के लिए उसका सम्मान किया गया था? क्या वह एक दिन की भावुकता थी या अभिनय?
कुछ देर बाद, उसने फिर हिम्मत जुटाई और बेटे के कमरे की ओर बढ़ी। जैसे ही वह दरवाजे के पास पहुँची, अंदर से आती बहू की आवाज सुनकर उसके कदम ठिठक गए।
“देखिए, कल मदर्स डे पर मैंने मां के साथ जो सेल्फी डाली थी, उस पर कितने सारे लाइक और कमेंट आये हैं! सब तारीफ कर रहे हैं हमारी संस्कारी सोच की,” बहू की आवाज थी।
बेटा गर्व से बोला, “मेरे ऑफिस में भी बॉस ने मेरी पोस्ट देखकर कहा कि तुम वाकई एक अच्छे बेटे हो। सबने मुझे मातृभक्त कहा। कितना अच्छा लगा!”
मां बाहर खड़ी सब सुन रही थी। तभी उसके पैर से रखी डस्टबिन टकरा गई और ज़ोर की आवाज हुई। कमरे से बहू और बेटा बाहर आए। डस्टबिन का कूड़ा फर्श पर बिखर गया था। बहू नाराज हो उठी।
“मम्मीजी! ध्यान नहीं रखते? सब कूड़ा बिखर गया! साफ-सफाई करनी पड़ेगी अब।” बेटा भी खिन्न भाव से बोला, “मां, थोड़ी सावधानी रखो न। यूं रोज-रोज छोटी-छोटी बातें झंझट बन जाती हैं।”
मां चुप रही। उसकी आंखें बेटे के चेहरे पर थीं, जो अब उसे देखने से भी कतराने लगा था। वह धीरे से पलटी और अपने कमरे में लौट गई।
कमरे में आते ही उसने अलमारी खोली। उसमें एक पुराना एलबम रखा था, पीले पड़े पन्नों में बसी उसकी पूरी ज़िंदगी। एक तस्वीर निकाली, जिसमें छोटा सा बच्चा था – वही बेटा – जो उसके कंधे पर बैठा खिलखिला रहा था।
मां को याद आया, कैसे उसने अकेले ही उसे पाला था, बीमारियों में रात-रात भर जागकर उसकी सेवा की थी। आज वही बेटा कुछ तस्वीरों के लाइक के लिए मां के साथ अभिनय कर रहा था।
बेटा और बहू अब सोशल मीडिया की वाहवाही में व्यस्त थे। मां अब उस दुनिया से बाहर थी, जहां इंसानी रिश्ते नहीं, डिजिटल प्रमाण पत्र ज़्यादा मायने रखते थे। और उधर मां अतीत में खो गयी थी।
दोपहर ढल रही थी। मां एक कोने में बैठी खिड़की से बाहर निहार रही थी। अंदर जैसे सन्नाटा पसर गया था। बेटे-बहू ऑफिस जा चुके थे। लेकिन मां के भीतर बहुत कुछ चल रहा था—स्मृतियाँ, अपमान, तिरस्कार और एक गहरी थकान।
उसने अपनी पुरानी डायरी निकाली। कुछ पीले पन्ने पलटे। हर पन्ना बेटे के बचपन से जुड़े किसी पल को समेटे हुए था—पहली राखी, पहली ताली, पहली चोट।
मां का मन कांप उठा। उसने मन ही मन सोचा—“क्या वही बेटा है जो मेरी गोद में घंटों सोया करता था? जो मेरी छांव में सुकून पाता था? आज उसी के घर में मैं सिर्फ एक पोस्ट का विषय भर बनकर रह गई हूँ।”
वह सोचती रही कि क्या मातृत्व का मूल्य बस एक दिन की पोस्ट और लाइक से मापा जा सकता है?
कभी जिस बेटे की सफलता पर दुनिया ने मां को सराहा था, आज उसी बेटे की नजर में मां एक ‘डिस्टर्बिंग एलिमेंट’ बन गई है।
अचानक मां ने कुछ निर्णय लिया। उसने आलमारी खोली, अपनी कुछ जरूरी चीजें एक थैले में रखीं—डायरी, चश्मा, दवा की पोटली और एक पुरानी तस्वीर जिसमें वह, उसका पति और छोटा बेटा एक साथ खड़े थे।
उसने एक चिट्ठी लिखी—
“बेटा,
मुझे अब किसी फोटो या पोस्ट में नहीं जीना।
अब मुझे वहां जाना है जहां मेरा होना किसी के एहसान की मोहताज न हो।
तुम्हारे बचपन की यादें मैं साथ ले जा रही हूँ। बाक़ी सब छोड़कर जा रही हूँ।
तुम्हारी मां।”
शाम को जब बेटा और बहू लौटे, तो मां नहीं थी। उसकी चिट्ठी टेबल पर रखी थी। बेटा पढ़ते-पढ़ते बैठ गया। बहू चुप खड़ी थी।
कमरे की दीवार पर टंगी एक फोटो—मदर्स डे की सेल्फी—अब निस्तेज सी लग रही थी।
बेटे की आंखें भर आईं। उसके अंदर कुछ टूटा था—शायद रिश्तों की नींव, शायद एक आडंबर का पर्दा। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
एक छोटे से वृद्धाश्रम में मां बाकी महिलाओं के साथ तुलसी के पास बैठी है, चेहरे पर संतोष है।
एक छोटी बच्ची (वहां आई किसी महिला की पोती) मां के पास आकर पूछती है—“दादी, आपके बच्चे कहां हैं?”
मां मुस्कुराती है, और कहती है—“वो तो अभी फेसबुक पर बहुत व्यस्त हैं। यहां आओ, मैं तुम्हें असली कहानी सुनाती हूँ—एक मां की कहानी।”
वृद्धाश्रम का आंगन, मां तुलसी के पास बैठी हैं, गोद में एक बच्ची है। उनके चेहरे पर शांति है। पीछे दीवार पर टंगी है पुरानी तस्वीर—जिसकी ओर माँ इशारा करती है
एक बेटे, मां और पिता की। नीचे लिखा है—
“मां कोई पोस्ट नहीं होती, वह पूरा जीवन होती है।”
अबोध बच्ची तस्वीर की ओर देख कर कुछ समझने की कोशिश करती है।
Shabddoot – शब्द दूत Online News Portal