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देश के जाने-माने शायर महेंद्र अश्क का निधन, महज नौ साल की उम्र से शुरू कर दी थी शायरी, साहित्य जगत में शोक

@शब्द दूत ब्यूरो (01 दिसंबर 2024)

नजीबाबाद। देश के प्रख्यात शायरों में शुमार महेंद्र सिंह अश्क का बीते रोज 79 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे।

महेंद्र सिंह अश्क देश के प्रतिष्ठित शायरों में शुमार होते हैं। उन्होंने लगभग 60 साल छोटे बड़े मंचों पर बिताए । जीवन का एक बड़ा हिस्सा देश – विदेश की यात्राओं में गुजरा है। देश के लगभग हर कोने में आप अनेक बार गए हैं। हवाई यात्राएं भी खूब की हैं। पाकिस्तान, ईरान, दुबई, डेनमार्क और लंदन सहित अनेक देशों में मुशायरे की सफलता के कारण बने हैं।

उनके पुत्र अमन कुमार त्यागी जो खुद एक साहित्यकार हैं, ने बताया कि पिता जी ने लगभग 9 या 10 साल की उम्र से अपने पिताजी और मामाओं के प्रभाव में आकर शायरी शुरू कर दी थी। जब बारह साल के हुए तो दादा जी चल बसे। दादा जी गांव के जमींदार काजी खानदान से होने के बावजूद बेहद शरीफ़ इंसान थे। अपने मित्रों या परिवारिकों में किसी को निराश नहीं किया। जिसने जो मांगा देते चले गए। इसीलिए घर परिवार के लोग उन्हें सूफी जी कहते थे।

अमन कुमार त्यागी बताते हैं कि पिता जी को हर जगह शायरी का ही माहौल मिला। विवाहोपरांत परिवार सहित अपने पैतृक गांव किवाड़ चले आए। यहां आकर खेती शुरू कराई, कुछ नौकर रखे और स्वयं गांव के जूनियर हाई स्कूल में मास्टरी शुरू कर दी, बाद में यह स्कूल सरकार के हाथ में चला गया तो उमरी पब्लिक स्कूल में नौमान साहब के साथ पढ़ाने लगे।

जब गांव में आए तो आपको निकटवर्ती कस्बे सहसपुर में एक बेहतरीन शायर श्रीजी से मुलाकात हुई और उन्हीं को आपने विधिवत उस्ताद घोषित किया। इधर अगर महेंद्र अश्क श्रीजी को पाकर निहाल हो रहे थे तो उधर श्रीजी भी निहाल हो गए थे। हद तो यह हो गई कि श्रीजी ने तमाम शायरों की मिन्नतों के बावजूद उन्हें शागिर्द नहीं बनाया। श्रीजी का कहना था – “बस महेंदर के सिवा कोई नहीं, मेरे लिए एक ही शागिर्द काफ़ी है।” इधर अश्क साहब का भी यही हाल था। पांच किलोमीटर जाना और पांच किलोमीटर आना लगभग दिनचर्या सा बन गया था।
ऐसा लगता है कि ये उस्ताद और शागिर्द ऊपर वाले ने ही बनाकर भेजे थे।

महेन्द्र अश्क जी का जन्म वास्तव में तो 1945 में सकट (जनवरी) में हुआ था परन्तु स्कूल में मास्टर साहब ने प्रवेश के दौरान 24 जुलाई 1945 दर्ज़ कर दी थी। हम लोग आज भी प्रतिवर्ष सकट को ही आपका जन्मदिन मनाते हैं।
जब उनका स्वास्थ्य खराब हुआ तो अमन कुमार त्यागी बताते हैं कि पिता जी 80 साल के हो चुके हैं, सख़्त बीमार हैं। फेफड़े लगभग 30 प्रतिशत काम कर रहे हैं। सांस लेने में कष्ट हो रहा है, आवाज़ नहीं निकल पा रही है। हालांकि सबकुछ समझ रहे हैं, याददाश्त भरपूर बनी हुई है। लिखकर बता भी रहे हैं। उनकी लिखावट को देखकर भी रोना आ रहा है। कभी बेहद अच्छी लिखावट होती थी किंतु आज उनके लिखे को पढ़ना मुश्किल हो रहा है।

शब्द दूत की ओर से देश के इस महान शायर को भावभीनी श्रद्धांजलि।

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