@शब्द दूत ब्यूरो (01जनवरी 2024)
काशीपुर। 2024 के पहले दिन काशीपुर की राजनीति पर एक चर्चा तो होनी चाहिए। शहर के राजनेता और राजनीतिक माहौल पर एक नजर। लोकसभा चुनाव की दहलीज पर है देश। देशभर में विभिन्न संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ने वाले सांसद प्रत्याशियों के नाम सामने आने लगे हैं। टिकट किसे मिलता है ये तो भविष्य के गर्भ में है। लेकिन एक समय में नैनीताल लोकसभा क्षेत्र का काशीपुर सांसद पद के प्रत्याशी को लेकर चर्चा में रहता था। आज यहां से सांसद पद के प्रत्याशी के रुप में किसी भी नेता की चर्चा नहीं होती।
सत्येन्द्र चंद्र गुड़िया और के सी सिंह बाबा ये दो नाम काशीपुर के किसी परिचय के मोहताज नहीं है। एक दौर था जब लोकसभा चुनाव होते थे तो काशीपुर के राजनेताओं का नाम सुर्खियों में रहता था। अब समय बदला जब भी लोकसभा चुनाव की बात होती है तो काशीपुर के किसी राजनेता का नाम संभावित प्रत्याशी के रुप में आना तो दूर उसकी चर्चा भी नहीं होती। वो दौर था जब काशीपुर की राजनीति केंद्र और प्रदेश को प्रभावित करती थी। पर अब यहां के राजनेता सिर्फ गाल बजाने और अन्य बड़े नेताओं की चापलूसी और उनके स्वागत करने तक सीमित होकर रह गए हैं।
शब्द दूत ने दिसंबर 2023 में शहर के तमाम लोगों से काशीपुर के किसी राजनेता का नाम सांसद पद के लिये जानना चाहा। इस दौरान आश्चर्य की बात यह रही कि कि किसी भी व्यक्ति ने शहर के किसी भी राजनेता का नाम नहीं लिया। लोगों का कहना था कि काशीपुर में कोई भी ऐसा राजनेता नहीं है जो कि सासंद पद की कसौटी पर खरा उतरता हो। अलबत्ता आस पास के शहरों के अनेक नाम जरूर बताये। आम जनता ने भी जता दिया कि फिलहाल काशीपुर में सांसद पद के प्रत्याशी का अभाव है। यहां शब्द दूत ने किसी दल विशेष का जिक्र नहीं किया। इसके बावजूद भी जनता को कोई राजनेता सांसद पद के योग्य नहीं मिला।
वहीं शब्द दूत ने कुछ राजनेताओं से भी आगामी लोकसभा चुनाव के लिए उनकी दावेदारी के बारे में सवाल किया तो उनकी ओर से भी कोई नाम काशीपुर से उभर कर नहीं सामने आया।
नतीजा आप कह सकते हैं कि काशीपुर की राजनीति ठहर गई है या थक गई है। राजनेताओं में जोश जरूर है पर वह जोश शहर के लिए नहीं है वरन् खुद को किसी तरह राजनीति में चमकाये रखने के लिए है। बहरहाल काशीपुर की राजनीति क्या थकी हुई रहेगी? ये एक ज्वलंत सवाल है कि शहर की तमाम समस्याओं को दरकिनार कर स्वयंभू राजनेताओं की राजनीति शहर की जनता के लिए कब तक अभिशाप बने रहेंगे? इस सवाल का जबाब तो ढूंढना ही होगा। 2024 में बदलेगी शहर की राजनीति या या यूं ही सब कुछ चलता रहेगा। स्वागत और समस्या की दोहरी राजनीति से निजात मिल पायेगी?
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