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चारधाम यात्रा: सरकारी रवैये के बीच नदारद मानवीय पहलू

@वेद भदोला

(13 मई, 2022)

उत्तराखंड में पटरी से उतरी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जिम्मेदार स्वास्थ्य मंत्री को एक धाम की जिम्मेदारी भी दिए जाने की खबर है। चारधाम यात्रा में लगातार मौतों का आंकड़ा बढ़ रहा है। वैसे तो ज्यादातर यात्री ही इन मौतों के लिए जिम्मेदार होते हैं, लेकिन तमाम सरकारी तामझाम भी यात्रियों को निष्कंटक यात्रा का भरोसा नहीं दिला पा रहा है।

खबर है कि यात्रा मार्ग पर यात्रियों के लिए स्वास्थ्य विभाग ने जबरदस्त इंतज़ामात किए हैं। सरकार की ओर से जारी विज्ञप्ति से तो यही प्रतीत होता है। सरकार की ओर जो इंतज़ामात बताए जा रहे हैं, लगभग स्वास्थ्य सेवा विहीन राज्य के लिए डॉक्टर्स, एम्बुलेंस, ब्लड बैंक इत्यादि सुखद आश्चर्य तो पैदा करते ही हैं।

बाकी, भगवान के दर्शनों के लिए बनाई गई सरकारी पंजीकरण व्यवस्था भी तार-तार दिख रही है। खबर है कि पंजीकरण के मामले में नितांत अनुभवहीन एक एजेंसी को भी प्रसादस्वरूप काम मिला है। ये अलग बात है कि इस कंपनी के कर्मचारी कंट्रोल रूम में लगाए टीवी सेट पर खबरों और यूट्यूब चैनल का आनंद ले रहे हैं।

सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद परिवहन व्यवस्था जस की तस है। सुधरना या सुधारना के बीच एक मात्रा के फर्क को भी नहीं मिटा पा रही सरकार। चारधाम यात्रा प्राइवेट टूर ऑपरेटर्स के लिए मानों ईश्वर की देन साबित हो जाती है। यात्रा के नाम पर यात्रियों से धड़ल्ले से लूट जारी है। बाकी सरकारी परिवहन व्यवस्था इस यज्ञ में अनमने भाव से आहुति दे ही रही है।

चारधाम का होटल व्यवसाय भी इन्हीं दिनों फलता-फूलता है। यात्रियों को सुविधाएं मिले या न मिले, सरकार को जीएसटी की चपत भले ही लग जाए, लेकिन ये तो ऐसे ही रहेंगे। भगवान के दर्शनों का पुण्य आप अर्जित करें, हमें तो माल इकट्ठा करने दें का भाव लिए ये निरंतर सेवा में तत्पर हैं। सरकार भी मूक और शांत भाव से सीजन निकल जाने का इंतजार करती रहती है।

यात्रा मार्ग पर भोजन व्यवस्था पर सरकार तो क्या, किसी का भी नियंत्रण नहीं रहता। ये एक ऐसा आवश्यक पहलू है जो पूरी यात्रा के दौरान अनछुआ ही रह जाता है। यात्री जो कुछ और जैसा भी मिला, खाने को मजबूर होते हैं। यानी पैसा भी खर्च हुआ और खाने को ढंग से कुछ नहीं। आश्चर्यजनक रूप से चारधाम यात्रा मार्ग में कहीं पर भी लंगर या भंडारे की व्यवस्था नहीं होती। ऐसा क्यों है, ये शोध का विषय हो सकता है।

पंजीकरण व्यवस्था को ध्वस्त करने और अफरातफरी का माहौल बनाने के लिए धामों, विशेषकर केदारनाथ और बदरीनाथ धाम की समिति जिम्मेदार है। क्योकि बोर्ड पर लिखी विशेष पूजा कभी भी उचित मूल्य चुकाकर की जा सकती है। भक्त और भगवान के बीच का ये वीआईपी कनेक्शन धाम के पंडे करवाते हैं। इसके लिए पंजीकरण की भी आवश्यकता नहीं होती।

पुरातन काल से ये माना जाता रहा है कि भगवान के दर्शनों के लिए थोड़ा बहुत कष्ट तो झेलना ही पड़ता है। बस, यही वह पेंच है जिसे समझा जाना जरूरी है। दरअसल, पहले यात्रा मार्ग इतने सुगम न थे। प्राकृतिक आपदाएं भी यात्रा को कठिन बना दिया करती थीं। चट्टियों पर रुकने की नाममात्र व्यवस्थाएं थीं। लेकिन तब ऐसी यात्राएं भक्त के भक्ति भाव से पूर्ण कर ली जाती थीं। लेकिन अब तमाम सुविधाओं के बावजूद भक्ति का वो मानवीय भाव मौजूद नहीं है।

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