@वेद भदोला
(05 मई, 2022)
तिरुपति बालाजी मंदिर में पचास हजार से लेकर एक लाख श्रद्धालु हर रोज आते हैं। विशेष मौकों जैसे सालाना ब्रह्मोत्सवम और त्योहारों पर श्रद्धालुओं की संख्या बढ़कर 4-5 लाख भी हो जाती है। इसी प्रकार वैष्णो देवी में भी दर्शनार्थियों का आंकड़ा सालभर में दो करोड़ के पार चला जाता है।
उत्तराखंड में सालभर की तैयारियों और यात्रा पर करोड़ों खर्च करने के बावजूद यात्रियों का आंकड़ा प्रतिदिन (चारों धाम मिलाकर) बमुश्किल पचास हजार भी नहीं पहुंचता। चारधाम यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं में उदासीनता की मुख्य वजह सरकारी बदइंतजामी ही है। यात्री पंजीकरण से लेकर यात्रा समाप्त होने तक श्रद्धालु भगवान भरोसे ही रहता है।
राज्य में सरकारें चाहे कोई भी रही हो, सबके लिए चारधाम यात्रा हमेशा नाक का मुद्दा रहा है। इसके बावजूद भी यात्रा की तैयारियों को लेकर हमेशा ही संशय की स्थिति बनी रहती है। उदाहरणस्वरूप पर्यटन और धर्मस्व मंत्री कह रहे हैं कि धामवार प्रतिदिन यात्री सीमित संख्या में दर्शन कर सकेंगे। जबकि मुख्यमंत्री के ताजा बयान के मुताबिक यात्रियों की संख्या असीमित हो सकती है।
यात्रा पंजीकरण, ट्रैफिक मैनेजमेंट, यात्रा के दौरान ठहरने की व्यवस्था, मार्ग में भोजन की व्यवस्था कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनपर अभी तक कुछ भी ठोस किया नहीं गया है। यदि चारधाम को धार्मिक पर्यटन के आधार पर राज्य की आर्थिकी का आधार बनाना है तो सरकार को महज रस्म अदायगी वाली आदत छोड़नी होगी। तभी आर्थिक रूप से विपन्न होते राज्य में कुछ संपन्नता दिखाई दे सकती है।
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