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काशीपुर फ्लैश बैक :जब सत्येंद्र चंद्र गुड़िया की एक डांट से अधिकारी वापस लौट गए ?राजनेता, पत्रकार, संस्कृति व कलाप्रेमी का बहुआयामी व्यक्तित्व

@शब्द दूत ब्यूरो (15 अप्रैल 2022)

काशीपुर । पूर्व सांसद स्वर्गीय सत्येंद्र चंद्र गुड़िया एक अच्छे नेता ही नहीं बल्कि एक अच्छे पत्रकार भी थे और उन्होंने 61 वर्ष तक शौंकिया पत्रकारिता भी की, मगर जैसी सुचिता उन्होंने राजनीति में दिखाती ऐसी ही सुचिता पत्रकारिता में भी निभाई । बल्कि यह कहा जाए कि उन्होंने पत्रकारिता को उसके मूल मंत्र अर्थात समाज सेवा के प्रति एक मिशन के रूप में अपनाया तो कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी ।  वह मान्यता प्राप्त पत्रकार थे । क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिवार से थे और इनके पिता किशोरीलाल गुड़िया समय-समय पर अंग्रेजी हकूमत का विरोध करते हुए जेल भी जाते रहते थे इसलिए परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत बेहतर नहीं थी ।श्री गुड़िया भले ही कम पढ़े लिखे थे मगर जितनी पढ़ाई उन्होंने की उस जमाने में वह बहुत मानी जाती थी। जरूरत पड़ने पर वह अंग्रेजी में भी वार्तालाप कर लेते थे। पारिवारिक हालात को देखते हुए श्री गुड़िया ने किशोरावस्था से ही प्रेस का कारोबार संभाल लिया था । गुड़िया प्रेस जो आजादी के आंदोलन में अहम भूमिका निभाती रही वह आज भी चल रही है और श्री गुड़िया द्वारा निकाला गया समाचार पत्र लोकतंत्र आज भी इसी प्रेस पर छप रहा है ।

23 वर्ष की उम्र में सत्येंद्र चंद गुड़िया का विवाह 5 दिसंबर 1956 को संभल निवासी हिंदू इंटर कॉलेज के प्रवक्ता गोविंद शंकर शुक्ला की 10 संतानों में से छह पुत्रियों में चौथे नंबर की बेटी विमला से हुआ ।इनके पिता संस्कृत के शास्त्री थे और बहुत विद्वान थे। पिता और माता रामकली देवी अत्यंत धार्मिक विचारों की थी जिस कारण विमला देवी पर भी उनके संस्कारों का पूरी तरह प्रभाव रहा।

श्रीमती विमला गुड़िया बताती हैं कि उनके पति सत्येंद्र चंद्र गुड़िया क्रोधी तो थे मगर उनका क्रोध क्षणिक होता था और क्रोध भी इसलिए आता था कि वह गलत बात किसी की पसंद नहीं करते थे। पारिवारिक जीवन में वह सभी के विचारों और भावनाओं का सम्मान करते थे। उन्हें भ्रमण का भी बहुत शौक था ।उन्होंने मुझे और बच्चों को सभी धामों की यात्रा कराई और विदेशों तक में घुमाया ।किसी को क्रोध में कुछ कह देते थे तो बाद में न सिर्फ खुद पश्चाताप करते थे बल्कि कई बार तो गलत बात पर जिस पर क्रोध करते थे उसके सामने भी अपने क्रोध को स्वीकार कर उस व्यक्ति को सामान्य कर देते थे ।

नारियों के प्रति उनके मन में काफी सम्मान था । उनकी सुरक्षा के प्रति भी सजग रहते थे और जब कभी पार्टी के कार्यक्रमों या नव चेतना मंच के कार्यक्रमों में महिलाओं को घर जाने में देर हो जाती थी तो उन्हें अपनी गाड़ी से छुड़वा देते थे। किसी काम में जब मैं उन्हें कोई राय देती थी तो वे उसे महत्व देते थे ।उन्हें बेटा ना होने का कभी मलाल नहीं रहा बल्कि अपनी तीनों बेटियों को बेटों से भी बढ़कर प्यार दिया व खूब पढ़ाया और बेटियों संग दामादो को बेटों जैसा प्यार दिया । बड़े दामाद प्रवीण कुमार शर्माकी असामयिक मृत्यु ने उनके
जीवन को इतना झकझोर दिया कि इस गम को श्री गुड़िया सह नहीं सके और 24 अप्रैल 2010 को शेर जैसा जीवन जीने वाले और किसी के सामने न झुकने वाले सत्येंद्र चंद गुड़िया मौत से जंग हार गए और हमें छोड़ कर परलोक गमन कर गए। श्रीमती विमला गुड़िया के अनुसार पारिवारिक जीवन में भी श्री गुड़िया बहुत अच्छे थे और हमेशा हंसते रहते थे। एक बार जब राजेश पायलट उनके पास आए तो श्री गुड़िया की हंसी देखकर उन्होंने कहा था कि गुड़िया जी बहुत खुशमिजाज व्यक्ति हैं और हमेशा हंसते रहते हैं ।श्रीमती विमला गुड़िया कहती हैं कि राजनीतिक जीत हार को भी वें कभी दिल पर नहीं लेते थे तथा चुनाव तक ही सीमित रखते थे और कहते थे कि राजनीति में हार जीत तो लगी रहती है ।वें राजनीति के ऊंचे से ऊंचे मुकाम पर रहे मगर कभी घमंड नहीं किया और पूरी तरह सादगी पसंद थे । वे हमेशा कहते थे कि इंसान को जमीन पर देख कर चलना चाहिए। वह भले ही आर्य समाजी थे मगर सभी धर्मों को भरपूर सम्मान देते थे ।वह समय के भी बहुत पाबंद थे ।उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में अपराधियों को कभी संरक्षण नहीं दिया साथ ही उन्होंने अपनी सुरक्षा के प्रति भी कभी कोई गंभीरता नहीं दिखाई और जब उत्तर प्रदेश में मंत्री बने तो जो सुरक्षा गार्ड उन्हें दिया गया उसे कहीं भी बैठा देते थे ।कभी किसी से उन्हें कोई डर नहीं लगा। एक बार विरोधियों के इशारे पर इनकम टैक्स के अधिकारियों ने उनके यहां रेड डालने की तैयारी की ।श्री गुड़िया ने उनसे कहा कि आइए आपका स्वागत है मगर ध्यान रखना कुछ ना मिला तो फिर अंजाम भुगतने के लिए भी तैयार रहना। इतना सुनकर अधिकारियों ने रेड डालने का कार्यक्रम रद्द कर दिया था। श्रीमती विमला गुड़िया बताती हैं की श्री गुड़िया हमेशा कांग्रेस के सच्चे सिपाही रहे। पंडित नारायण दत्त तिवारी, जयपुर की इंदिरा मायाराम ,दया चौधरी इंदिरा ह्रदयेश ,सुशीला तिवारी सहित तमाम बड़े नेता समय-समय पर उनके यहां आते जाते रहते थे जिनके खाने और रहने की व्यवस्था मैं हमेशा खुशी-खुशी करती थी। यही कारण था कि श्री गुड़िया हमेशा मेरी बात को मान देते थे और जब कभी मैं उन्हें कोई राय देती थी तो उसको मानते भी थे ।

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