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काशीपुर :स्व. सत्येंद्र चंद्र गुड़िया की हार से शुरू कांग्रेस के पतन की कहानी, भाजपा को तोहफा देती रही कांग्रेस, एक बेबाक और कड़वी सच्चाई

@शब्द दूत ब्यूरो (27 मार्च 2022)

काशीपुर । अपनी जिस परंपरागत काशीपुर विधानसभा सीट को खुद गंवाकर कांग्रेस पिछले 34 वर्षों से राजनीतिक अज्ञातवास झेल रही है और लगातार चुनाव जीतने के लिए फड़फड़ा रही है। उसमें हकीकत तो यह है कि कांग्रेस ने आज तक चुनाव जीतने की कोशिश ही नहीं की। उल्टे उसने खुद भाजपा प्रत्याशी हरभजन सिंह चीमा को राजनीतिक दूध पिला कर इतना मजबूत कर दिया कि अपना पहला चुनाव मात्र 195 वोटों से जीतने वाले चीमा की जीत का अंतर 20 हजार से भी अधिक तो राजनीति में अपेक्षाकृत नये व कम अनुभवी  उनके पुत्र त्रिलोक सिंह चीमा की जीत का ग्राफ 16000 वोटों के अंतर के भी पार पहुंच गया है।

देश और प्रदेश के अन्य भागो की तरह कांग्रेस की सत्ता के चलते जिस काशीपुर का विकास कर पं० नारायण दत्त तिवारी विकास पुरुष कहलाए। उस काशीपुर की मौजूदा दुर्दशा की जिम्मेदार भी यदि कोई है तो वह भाजपा नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ वही कांग्रेस है। जिसे विरोधियों ने नहीं बल्कि हर बार खुद कांग्रेसियों ने ही करवाया है।

2007 के विधानसभा चुनाव में यदि कांग्रेस दो फाड न हुई होती और सभी कांग्रेसी एक मंच पर आकर चुनाव लड़ा देते तो इस क्षेत्र की राजनीति के पितामह कहे जाने वाले सत्येंद्र चंद गुड़िया चुनाव न हारते । कांग्रेसियों की उस एकता से दो बातें होती। एक तो कांग्रेस का राजनीतिक वनवास समाप्त हो जाता और दूसरे इस क्षेत्र को चीमा के तथाकथित निराशाजनक कहे जाने वाले चर्चित कार्यकाल से निजात मिल जाती। उस चुनाव में कांग्रेस के सत्येंद्र चंद्र गुड़िया को करीब साढ़े 15 हजार तो कांग्रेस से अलग होकर निर्दलीय चुनाव लड़े मुकेश मेहरोत्रा को करीब साढ़े 10 हजार वोट मिले थे जबकि विजयी रहे चीमा को करीब तीस हजार वोट मिले ।यदि श्री गुड़िया और श्री मेहरोत्रा के वोटों को जोड कर देखा जाए तो टोटल बनता है करीब 26000 अर्थात जीत और हार का अंतर मात्र 4 हजार के आस पास बैठ रहा था। लेकिन सोचिए कि काश उस वक्त कांग्रेस एक हो जाती तो मतदाताओं के दिमाग से यह बात निकल जाती कि एक ही पार्टी के दो नेता चुनाव लड रहे हैं। लिहाजा कांग्रेस चुनाव नहीं जीतेगी इसलिए वोट किसी और को दे दिया जाए। इस भावना के समाप्त होने से कांग्रेस के वोटों में बढ़ोतरी होती और श्री चीमा की चार हजार वोटों की जीत का अंतर घट कर इतना कम हो सकता था कि श्री गुड़िया चुनाव जीत जाते। भले ही उस समय सरकार कांग्रेस की नहीं बनी ,मगर कांग्रेस के राज में अपने राजनीतिक विरोधियों के भी काम कराने वाले और विकास की सोच रखने वाले सत्येंद्र चंद्र गुड़िया काशीपुर क्षेत्र का इतना विकास तो करा ही देते कि आज जो दुर्दशा दिखाई दे रही है वह इतनी बुरी न दिखाई देती।

2002 में जब भाजपा ने अपने दो बार के विधायक रहे राजीव अग्रवाल का टिकट काटकर शिरोमणि अकाली दल के हरभजन सिंह चीमा को प्रदेश की पहली विधानसभा के चुनावी समर में उतारा था तो लोग आश्चर्य चकित रह गए थे । कहने वाले ने तो यहां तक कह दिया था कि भाजपा ने खुद काशीपुर विधानसभा सीट प्लेट में रखकर कांग्रेस को दे दी है, मगर कांग्रेस को प्लेट पकड़नी ही नहीं आई और चीमा महज 195 वोटों से कुमाऊं नरेश को शिकस्त देकर चुनाव जीत गए ।

कांग्रेस हर बार चुनावी संग्राम का आगाज तो इतने जोर शोर से करती है कि जैसे वह ऐतिहासिक जीत का परचम लहराकर ही मानेगी मगर चुनाव आते आते खुद कांग्रेसी ही कांग्रेस को हराने में लग जाते हैं ।सच तो यह है कि बार-बार चुनाव हार कर भी कांग्रेसी हर बार  साढ़े चार साल तक तो धरने प्रदर्शन और पुतले फूंकने में पूरी एकता दिखाते हैं मगर चुनाव से महज चार छ महीने पूर्व उनमें इतनी फूट पड़ जाती है कि पार्टी के दिग्गज भी फेल हो जाते हैं।

यही कारण है कि बीता चुनाव गवाह है कि 10 साल से मेहनत कर रहे जुझारु चेहरे की बजाए पार्टी द्वारा उस चेहरे को टिकट दे दिया जाता है जिसके बारे में खुद मतदाताओं में चर्चा छिड़ गयी थी कि न तो मतदाता उसे पहचानते और न वह मतदाताओं को। इतिहास गवाह है कि कांग्रेस पिछली बार जीता हुआ मेयर चुनाव हार गई थी। पता सबको है मगर अनुशासन का चाबुक कौन चलाएं ? एक-एक कर कांग्रेस के सारे महारथी हारते जा रहे हैं मगर सबक लेने को कोई तैयार नहीं ।

मेयर चुनाव में तो कई पार्टियों में रह कर आए एक नेता ने ऐसा खेल खेला था कि काश उस अकेले पर ही पार्टी अंकुश लगा देती तो मेयर की सीट कांग्रेस की झोली में होती । चुनावी समीक्षा में उस नेता के विरुद्ध शोर तो बहुत मचा मगर कोई भी उसका बाल बांका नहीं कर पाया ।अब भी चर्चाएं हैं कि विधायक का चुनाव लगातार हारने के बाद कांग्रेस ने यदि समय रहते उस नेता को बाहर का रास्ता अथवा उस पर अभी से अंकुश न लगाया तो वह इस बार फिर निकाय चुनाव में कांग्रेस को मेयर की सीट से महरूम करा देगा।

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