@शब्द दूत ब्यूरो
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन बिल के खिलाफ धरने को लेकर अपने पुराने फैसले पर विचार करने से इनकार किया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लंबे समय तक विरोध करके सार्वजनिक स्थान पर दूसरों के अधिकारों को प्रभावित नहीं किया जा सकता। विरोध का अधिकार कभी भी और हर जगह नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक विरोध दूसरों के अधिकारों को प्रभावित करने वाले सार्वजनिक स्थान पर कब्जा करके जारी नहीं रख सकता है।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि संवैधानिक योजना विरोध प्रदर्शन और असंतोष व्यक्त करने के अधिकार देती है, लेकिन कुछ कर्तव्यों की बाध्यता के साथ। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि हमने सिविल अपील में पुनर्विचार याचिका और रिकॉर्ड पर विचार किया है। हमने उसमें कोई गलती नहीं पाई है। जस्टिस एसके कौल, जस्टिस अनिरुद्ध बोस और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ ने ये फैसला सुनाया है।
दरअसल नागरिकता संशोधन एक्ट के खिलाफ शाहीन बाग में प्रदर्शन करने वाली महिलाओं ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका में ही एक और अर्जी लगाई थी। महिलाओं ने मांग की थी कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा आंदोलन को लेकर अक्टूबर, 2020 में जो आदेश दिया गया, उस पर फिर से सुनवाई की जाए।
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