@शब्द दूत ब्यूरो (16 मार्च 2024)
देहरादून। उत्तराखंड की बहू-बेटियों की चीख और नौजवानों के लहू से सनी मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश) की धरती आज भी सरकारी सिस्टम की बर्बरता की कहानी बयां करती है।
रामपुर तिराहा कांड को 30 वर्ष बीत जाने के बाद कोर्ट ने दरिंदगी करने वाले दो पुलिस कर्मियों को दोषी करार दिया है। इससे उत्तराखंडवासियों के जख्मों पर कुछ मरहम तो लगा है, लेकिन एक लंबा अरसा बीतने से दिल में टीस भी है। कोर्ट के फैसले से उत्तराखंड के राज्य आंदोलनकारियों के कलेजे पर थोड़ी ठंडक तो पड़ी, लेकिन न्याय प्रक्रिया की खामियों पर उन्होंने नाराजगी भी व्यक्त की है।
अब भी कई सवाल जस के तस तैर रहे हैं कि उत्तराखंड राज्य की मांग कर रही यहां की जनता पर बर्बरता किसके आदेश पर हुई। कांड के मुख्य आरोपितों को सजा कब मिलेगी। हालांकि, रामपुर तिराहा कांड में बलिदान हुए युवाओं और दुष्कर्म का शिकार हुई महिलाओं के जख्मों की भरपाई नहीं की जा सकती। सैकड़ों परिवार इस कांड का दंश आजतक झेल रहे हैं।
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