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एक्सक्लूसिव रिपोर्ट:उत्तराखंड में एक अधिकारी चर्चाओं में, राष्ट्रपति के पत्र के बावजूद जांच क्यों नहीं? सरकार की छवि हो रही खराब, जानें कौन हैं वो अधिकारी?

राष्ट्रपति कार्यालय से जांच को आया पत्र

@शब्द दूत ब्यूरो (09 अगस्त 2023)

देहरादून। क्या मुख्यमंत्री आय से अधिक सम्पत्ति के अन्य आरोपी अपर सचिव अरुणेंद्र सिंह चौहान की भी विजिलेंस जांच बैठाएंगे ? आरोपी की निदेशक वित्त के लिए चल रही पत्रावली ।

राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री कार्यालय, सीबीआई से आया पत्र कहाँ और किसने दबाया ?

अरूणेन्द्र चौहान

अरुणेंद्र सिंह चौहान , सारंगी के खास और खंडूरी के OSD रहे है और अब चर्चा है कि धामी के खिलाफ सभी चर्चाओं में अरुणेंद्र सिंह काफी समय से लॉबिंग कर रहे है , और इनके भ्रष्टाचार को कई समाचार पत्र और पोर्टल कई बार लिख चुके है और धामी सरकार की छवि खराब करने वाले अफसर  अरुणेंद्र सिंह चौहान को कई पदों से पिछले दिनों हटा दिया गया। लेकिन जो जांच उनके खिलाफ राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री और सीबीआई से आयी है उनको भी खोज निकाल कर तत्काल विजिलेंस को देना होगा ।

अरुणेंद्र पर यह भी आरोप है कि उन्होंने एक मेडिकल कॉलेज को बहुत मदद की और आज 5 वर्ष होने पर भी सरकार सुभारती से 72 करोड़ वसूलने में इनकी वजह से विफल रही है अपितु इस संस्था से पैसा वसूलने के बजाय इस संस्था को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन से 4 करोड़ का भुगतान कर दिया गया।  जबकि अपर सचिव, चिकित्सा शिक्षा , स्वास्थ्य एवं मिशन के सीईओ अरुणेंद्र सिंह चौहान के संज्ञान में यह पूरा मामला था और इनको संस्था के 72 करोड़ रुपये में से 4 करोड़ रुपये काटने चाहिए थे अथवा रोकने चाहिए थे जो आज तक 2018 से वसूल नहीं हो पायी है।

इसके विपरीत इस बंद चले आ रहे अस्पताल को 4 करोड़ रुपये का और भुगतान कर दिया गया ।  बड़ा सवाल यह उठ गया है कि 2011 से 2016 तक अस्पताल चला ही नहीं और 2017 से 2019 सरकार ने इस पर रोक लगा दी । बंद , कोर्ट ,कचहरी आदि मामलों के चलते यहां बड़ा घोटाला चल रहा है। सरकारी रिपोर्ट स्पष्ट दर्शा रही है कि अस्पताल 2017 से दिसंबर 2020 तक क्रियाशील ( 2 वर्षो से ) नहीं है और जून 2020 आर टी आई से पता चलता है कि  लगभग 4 करोड़ का भुगतान इस संस्था किया गया तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आते है कि बंद अस्पताल को मुख्यमंत्री स्वास्थ्य योजना और आयुष्मान योजना का भुगतान कैसे हुआ ?

क्या था मामला ?

मामला यह था कि अरुणेंद्र सिंह चौहान ने अपर सचिव चिकित्सा शिक्षा रहते बंद पड़े हॉस्पिटल को आयुष्मान योजना से करोड़ों रूपये दिये। फिर  गौतम बुद्ध सुभारती चिकित्सा महाविद्यालय ( अल्पसंख्यक केवल ) खोलने हेतु पत्रावली शुरू की। जिसमें उसी संस्था का नाम बदल (पुराना नाम डा जगत नारायण सुभारती ट्रस्ट जिस पर 97 करोड़ पेनल्टी लगी थी और सम्पत्ति अटैच की गयी थी ) कर चलायी । बिना निदेशालय की जांच समिति की रिपोर्ट को पत्रावली पर लिए एवं उसका अवलोकन किये ऊपर ही ऊपर उसका अनुमोदन करवा दिया । जिसमे यह लिखा गया कि समय के अभाव में रिपोर्ट देखना संभव नहीं है । भला यह कैसा तर्क हुआ यानी गलत काम को कर दो चाहे उसमे लाख खामियां हो और नियम और कानून ताक पर रख दिए गए।
जब एडीएम के के मिश्रा को शिकायत कर्ता ने सबूत दिखाया तो उन्होंने दुबारा जांच के लिए तहसीलदार को लिखा।  और तब  बड़ा खुलासा हुआ कि  शिकायत कर्ता की सभी शिकायत और सबूत सही थे कर और इससे पहले कि वो अपनी नयी रिपोर्ट देते उनका तबादल चमोली कर दिया गया जैसे की उनको इसकी सजा दी गयी हो।

एनएमसी के मानकों के अनुसार मेडिकल कॉलेज की अनुमति /एन ओ सी किसी कोर्ट में चल रहे विवादित जमीन पर नहीं दी जा सकती । जिसकी राज्य के दिल्ली हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट में बैठे महाधिवक्ता जे के सेठी ने भी पुष्टि की है।  और जमीन उसी संस्था के नाम होनी चाहिए जिसको अनुमति दी जाये । परन्तु यहाँ भी अरुणेंद्र सिंह चौहान ने 7 लोगो द्वारा गठित निरीक्षण समिति की रिपोर्ट एवं सचिव अमित नेगी की रिपोर्ट को दरकिनार करते हुऐ जिस संस्था के नाम एक बीघा भी जमीन नहीं है । उस संस्था के नाम अनिवार्यता प्रमाण जारी कर दिया और वो भी अल्पसंख्यक मेडिकल कॉलेज का जबकि संस्था अल्पसंख्यक भी नहीं है।

सुभारती के दिए शपथ पत्र में स्वयं यही लिखा है की यदि कोई लोन निकला तो उनका अनिवार्यता प्रमाण पत्र / सेंटिअलिटी सर्टिफिकेट/NOC स्वयं ही निरस्त मानी जाएगी। और तो और तीसरा बैच भर लिया एक छात्र से 28लाख प्रतिवर्ष ले लिए तो 450 बच्चो के अरबो रुपये इक्क्ठे हुए तो भी सरकार के 97 करोड़ नहीं दे रहे क्योकी शुरू से घोटाला करने की नियत है।

यही नहीं आनन् -फानन में रातों-रात  गौतम बुद्ध सुभारती की फीस भी बिना फीस कमेटी की अनुमति लिए निर्धारित कर दी और उसमे भी बड़ा खेल हुआ ।
जब गौतम बुद्ध चिकित्सा महाविद्यालय यानि सुभारती मेडिकल कॉलेज की फीस निर्धारण का समय आया तो उस पत्र में लिखा गया कि गुरु राम राय मेडिकल कॉलेज के बराबर होगी जबकि नियम यह है कि नए कॉलेज की फीस कम होती है । क्यूंकि जब गुरु राम राय मेडिकल कॉलेज को पहला बैच मिला तो उसकी फीस मात्र 2,90,000 थी । तो आज की फीस कैसे निर्धारित कर दी गयी? क्यों पहाड़ी राज्य के छात्रों और उनके माता पिता का गला घोंटा गया ? और अब गुरु राम राय के छात्र हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक केस लड़ रहे है क्यूंकि बाद में 1 करोड़ और मांग लिए गए और इन छात्रों से भी वही माँगा जायेगा इसलिए भी इस कॉलेज गौतम बुद्ध चिकित्सा महाविद्यालय की जांच जरुरी है ।

अन्यथा छात्रों के साथ बड़ा अन्याय होगा। बता दें कि इस कालेज के मालिक  एवं इनके अन्य ट्रस्टियों पर आपराधिक मुकदमे जैसे हत्या आदि के लंबित है।  और ग़ाज़ियाबाद कोर्ट में अतुल भटनागर पर हत्या की धारा 302 एवं 120 बी का ट्रायल चल रहा हे जिसमे ये कभी भी जेल जा सकता है क्या ऐसे उत्तराखंड की अस्मत लूटने वालो के लिए ये प्रदेश बनाया गया था ?

 

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