नीतीश कुमार और राष्ट्रपति ?एक नई बहस पर वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल का नजरिया

राकेश अचल, लेखक देश के जाने-माने पत्रकार और चिंतक हैं, कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में इनके आलेख प्रकाशित होते हैं।

एक लोक कहावत है -‘ ये मुंह और मसूर की दाल ‘,बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर ये लोकोक्ति पूरी तरह से लागू हो सकती है. वे राजनीति के साथ ही सत्ता सुख से अभी अघाये नहीं हैं,और अब इसी साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए तीसरे फ्रंट की और से प्रत्याशी बनकर राष्ट्रपति पद तक पहुंचना चाहते है .ख्वाब देखना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन नीतीश कुमार का व्यक्तित्व ऐसा नहीं है कि वे देश के सर्वोच्च पद की प्रत्याशा तक करें .

देश का अगला राष्ट्रपति जाहिर है कि सत्तारूढ़ भाजपा की पसंद का होगा .भाजपा अपने दल के किसी व्यक्ति को इस पद पर ले जाना चाहती है या अपने किसी सहयोगी दल के व्यक्ति को अभी से कहना कठिन है ,लेकिन मौजूदा परिदृश्य में भाजपा अपने दल के बाहर के किसी व्यक्ति को राष्ट्रपति पद पर ले जाने के लिए विवश हो सकती है .सहयोगी दल के रूप में जद यू भाजपा के लिए फिलहाल एक टिकाऊ साथी है इसलिए नीतीश कुमार के मन में लड्डू फूट रहे हैं .

राष्ट्रपति पद पर भाजपा पूर्व में श्री रामनाथ कोविद को लायी थी,वे प्रणब मुखर्जी के उत्तराधिकारी बनाये गए थे लेकिन वे पद की गरिमा के अनुरूप आचरण करने में कामयाब नहीं हुए .उनकी निष्ठाएं जाहिरा तौर पर भाजपा के साथ थीं ,लेकिन इसमने कोई बुराई नहीं थी,बुराई थी उनके आचरण और प्रोटोकाल की अनदेखी करने में . .अब रामनाथ जी के बाद भाजपा के पास राष्ट्रपति पद के लिए तमाम नाम हो सकते हैं ,फिर भी नीतीश कुमार को लगता है कि वे इस पद के लिए सबसे अधिक सही उम्मीदवार होंगे .

नीतीश कुमार जेपी आंदोलन की पैदाइश हैं. इसी आंदोलन की एक पैदाइश पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव भी थे .वे जेल में हैं और नीतीश कुमार सत्ता में .नीतीश का राजनीतिक जीवन सबके सामने है. वे केंद्र में तीन बार मंत्री रहने के साथ ही छह मर्तबा बिहार के मुख्यमंत्री भी बन चुके हैं .एक जमाने में वे भाजपा के धुर विरोधी थे लेकिन बाद में वे भाजपा के करीब आते-आते आज भाजपा के बगलगीर बन चुके हैं .बिना भाजपा के अब उनका वजूद पहले जैसा नहीं रहा .अब वे सुशासन बाबू भी नहीं रहे .

नीतीश कुमार के चेहरा,चाल और चरित्र अब ऐसा नहीं रह गया कि वे राष्ट्रीय नेतृत्व के लायक माने जाएँ. एक जमाने में में नीतीश कुमार को गैर कांग्रेसी दलों की और से प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी भी माना जाने लगा था लेकिन उनका नसीब ,वे केंद्र से लौटकर दोबारा राज्य की राजनीति में लौट गए .उन्होंने जेपी आंदोलन के साथ लालू प्रसाद की डेढ़ दशक पुरानी सरकार को हटाने में में कामयाबी हासिल की और सरकार चलाने के लिए भाजपा से गठजोड़ किया जो आज भी जारी है
दुर्भाग्य से अब नीतीश कुमार का व्यक्तित्व ऐसा नहीं रहा जो सभी गैर कांग्रेसी दल राष्ट्रपति पद के लिए उनकी उम्मीदवारी का समर्थन कर दें .अब गैर कांग्रेसी दलों में भी पहले जैसा एका नहीं है. पिछले सात साल में भाजपा भी पहले जैसी सर्वशक्तिमान नहीं रही .पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद ही तय हो पायेगा कि भाजपा राष्ट्रपति पद के चुनाव को लेकर कितनी सहज या असहज है .

केंद्र की सत्ता में आने के बाद भाजपा केवल रामनाथ कोविद को इस पद पर ला पायी थी.ये दूसरा मौक़ा है जब भाजपा राष्ट्रपति पद पर अपनी पसंद का प्रत्याशी ला सकती है .भाजपा को कुछ दिनों तक तो कांग्रेस द्वारा बनाये गए राष्ट्रपतियों से काम चलना पड़ा था,ये बात और है कि अंत में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी आधे भाजपा समर्थक हो गए थे ,भाजपा भी कांग्रेस की तरह नहीं चाहती कि राष्ट्रपति पद पर कोई लोकप्रिय नेता पहुंचे .सब को रबर स्टाम्प चाहिए और नीतीश कुमार पर भाजपा इस मायने में भरोसा नहीं कर सकती .

देश का सत्रहवां राष्ट्रपति चुनते समय भाजपा ने दलित कार्ड खेला था ,इस बार भाजपा कौन सा कार्ड खेलने पर विवश होगी अभी से कहना कठिन है .पर एक बात तो है किअब भाजपा के लिए अपनी पसंद का प्रत्याशी देश के सर्वोच्च पद तक पहुँचना पहले की तरह आसान नहीं होगा ,कम से कम नीतीश कुमार को लेकर तो भाजपा ख्वाब में भी आगे नहीं बढ़ सकती .नीतीश कुमार न तो राष्ट्रपति रामनाथ कोविद की तरह अनुशासित भाजपाई हैं और न मौनी बाबा. वे वाचाल भी हैं और उपद्रवी स्वभाव के भी .वे भाजपा के लिए रबर स्टाम्प बनना क्यों पसंद करेंगे कहना कठिन है .

ढलती उम्र के कारण नीतीश कुमार अब विधानसभा या लोकसभा का चुनाव लड़ने से बचना चाहते हैं इसलिए विकल्प के तौर पर उनकी नजर राष्ट्रपति पद पर है और मुमकिन है कि इस पद को लेकर उन्होंने अपना नाम खुद ही हवा में उछाला हो ,लेकिन उन्हें इस कोशिश में कोई कामयाबी मिल पायेगी ऐसा मुझे नहीं लगता .भाजपा पिछले सात साल में कई बार दूध से जली हुई है ,इसलिए अब भाजपा छाछ भी फूंक-फूंक कर पियेगी.भाजपा मुमकिन है अपने उपराष्ट्रपति का ही राष्ट्रपति के रूप में प्रमोशन कर दे लेकिन किसी भी सूरत में नीतीश को तो अपना प्रत्याशी नहीं बनाएगी .
@ राकेश अचल

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