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हरीश रावत की यात्रा और कांग्रेस हाईकमान की सख्ती: टकराव के पीछे क्या है? जनसंवाद यात्रा स्थगित

@विनोद भगत

उत्तराखंड कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ को लेकर उठा विवाद महज एक यात्रा रोकने या जारी रखने का मामला नहीं है। इसके पीछे पार्टी संगठन, वरिष्ठ नेताओं की राजनीतिक सक्रियता और आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच समन्वय का बड़ा सवाल दिखाई देता है। कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने स्पष्ट किया कि राज्य में चुनावी अभियान सामूहिक और पार्टी के आधिकारिक मंच के तहत चलाया जाना चाहिए। इसके बाद रावत ने अपनी आगे की 8-10 यात्राएं स्थगित करने की घोषणा की।

रावत का अपना पक्ष भी महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि यात्रा का उद्देश्य कांग्रेस को सक्रिय करना और कार्यकर्ताओं के बीच संवाद बढ़ाना था। उन्होंने यह भी कहा कि यदि पार्टी कोई साझा कार्यक्रम बनाती है तो वह उसके अनुसार आगे बढ़ेंगे। यानी रावत ने यात्रा को पूरी तरह राजनीतिक विद्रोह के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि इसे संगठन को सक्रिय करने वाली पहल के तौर पर बताया है।

लेकिन विवाद का दूसरा पहलू कांग्रेस संगठन की चिंता है। प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा ने पहले ही रावत की यात्रा को लेकर आपत्ति जताई थी और कहा था कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी या प्रभारी से चर्चा किए बिना समानांतर कार्यक्रम चलाना उचित नहीं है। पार्टी नेतृत्व की दृष्टि से चुनाव के पहले अलग-अलग नेताओं के स्वतंत्र कार्यक्रमों की बजाय एक साझा अभियान की आवश्यकता स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है।

यहां असली राजनीतिक प्रश्न यह है कि किसी वरिष्ठ नेता की व्यक्तिगत लोकप्रियता और संगठनात्मक अनुशासन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। हरीश रावत लंबे समय से उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे हैं। इसलिए उनकी सक्रियता को पूरी तरह नजरअंदाज करना पार्टी के लिए आसान नहीं है। दूसरी ओर, यदि प्रत्येक वरिष्ठ नेता अपने स्तर पर अलग राजनीतिक कार्यक्रम चलाने लगे तो चुनावी रणनीति में एकरूपता बनाए रखना संगठन के लिए चुनौती बन सकता है।

रावत की यात्रा को लेकर सामने आई तस्वीरों ने इस विवाद को और राजनीतिक अर्थ दिया है। 6 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार रामनगर में उनकी यात्रा के दौरान कई कांग्रेस नेता और पूर्व विधायक भी दिखाई दिए तथा समर्थकों ने उनका स्वागत किया। इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि यात्रा केवल व्यक्तिगत जनसंपर्क तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसमें पार्टी के विभिन्न नेताओं और कार्यकर्ताओं की भागीदारी भी दिखाई दी। हालांकि, इससे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि पूरी कांग्रेस इस यात्रा के पक्ष में है।

रावत की ओर से आगे की यात्राएं स्थगित करने का फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे तत्काल टकराव को कुछ हद तक कम करने का रास्ता खुलता है। अब सवाल यात्रा से ज्यादा उस राजनीतिक संवाद का है जो रावत और कांग्रेस नेतृत्व के बीच होना है। रावत ने कहा है कि पार्टी को स्पष्टीकरण मांगने का अधिकार है और वह अपना पक्ष रखेंगे।

सितंबर में रावत ने कांग्रेस के दो पदों से इस्तीफा देने की इच्छा भी सार्वजनिक रूप से जताई थी, हालांकि उस समय उन्होंने औपचारिक इस्तीफा नहीं दिया था। इस पृष्ठभूमि में अक्टूबर की यात्रा का विवाद अलग-थलग घटना के बजाय कांग्रेस संगठन के भीतर उनकी भूमिका और सक्रियता को लेकर चल रही व्यापक चर्चा का हिस्सा माना जा सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम बात यह है कि इसे केवल ‘रावत बनाम हाईकमान’ के रूप में देखना शायद तस्वीर को बहुत सरल बना देगा। एक तरफ रावत अपनी राजनीतिक सक्रियता के जरिए कार्यकर्ताओं और जनता से संवाद बनाए रखना चाहते हैं, दूसरी तरफ कांग्रेस नेतृत्व चुनाव से पहले संगठनात्मक नियंत्रण और सामूहिक अभियान पर जोर दे रहा है। दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं।

अब आगे की दिशा इस बात से तय होगी कि कांग्रेस नेतृत्व रावत की राजनीतिक ऊर्जा को किस तरह पार्टी के सामूहिक अभियान से जोड़ता है और रावत स्वयं संगठनात्मक ढांचे के भीतर अपनी भूमिका को किस रूप में आगे बढ़ाते हैं। यदि दोनों के बीच समन्वय स्थापित होता है तो मौजूदा विवाद पार्टी के लिए संगठन को सक्रिय करने का अवसर भी बन सकता है। लेकिन यदि व्यक्तिगत कार्यक्रम और संगठनात्मक निर्देश के बीच दूरी बनी रहती है तो यह विवाद आने वाले चुनावी समय में कांग्रेस की आंतरिक राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बना रह सकता है।

फिलहाल रावत का आगे की यात्राएं स्थगित करना पीछे हटने से ज्यादा संवाद के लिए जगह बनाने वाला कदम दिखाई देता है। अंतिम तस्वीर पार्टी नेतृत्व के साथ उनकी आगामी बातचीत और उसके बाद तय होने वाली संयुक्त राजनीतिक रणनीति से ही स्पष्ट होगी।

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