@शब्द दूत ब्यूरो (15 अगस्त 2026)
नई दिल्ली। आजादी के बाद भारत की पहचान बने तिरंगे का स्वरूप हमेशा से ऐसा नहीं था, जैसा आज हम देखते हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय ध्वज के कई स्वरूप सामने आए और समय के साथ उनमें बदलाव होता गया। इन बदलावों के पीछे भारत के स्वतंत्रता संघर्ष, स्वराज की आकांक्षा और राष्ट्रीय एकता की भावना की कहानी छिपी है।
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अनुसार भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के विकास का प्रमाणित इतिहास 1906 से स्पष्ट रूप से सामने आता है। 7 अगस्त 1906 को कलकत्ता के पारसी बागान स्क्वायर में पहली बार भारत का एक राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। यह स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन के दौर का प्रतीक था। इसके बाद 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने इसी से मिलता-जुलता संशोधित ध्वज पेरिस में फहराया। यह ध्वज बर्लिन में आयोजित समाजवादी सम्मेलन में भी प्रदर्शित किया गया और स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने वाला महत्वपूर्ण प्रतीक बना।
1917 में होम रूल आंदोलन के दौरान एनी बेसेंट और बाल गंगाधर तिलक से जुड़ा एक नया ध्वज सामने आया। इस ध्वज में लाल और हरे रंग की धारियां, सप्तऋषि के सात तारों का विन्यास और ऊपरी हिस्से में यूनियन जैक सहित अन्य प्रतीक थे। यह ध्वज उस समय भारत के लिए स्वशासन की मांग का प्रतिनिधित्व करता था।
1921 में ध्वज के विकास में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। विजयवाड़ा में कांग्रेस के अधिवेशन के दौरान पिंगली वेंकैया ने महात्मा गांधी के सामने एक ध्वज का डिजाइन प्रस्तुत किया। इसमें तीन रंगों की पट्टियां थीं और बीच में चरखा बनाया गया था। चरखा भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता और स्वदेशी भावना का प्रतीक बना।
1931 में ध्वज के स्वरूप में फिर महत्वपूर्ण बदलाव किया गया। पिंगली वेंकैया के डिजाइन में संशोधन करते हुए लाल रंग की जगह केसरिया रंग को अपनाया गया। केसरिया साहस और त्याग, सफेद शांति और सत्य तथा हरा रंग उर्वरता और विकास का प्रतीक माना गया। यह ध्वज आगे चलकर वर्तमान तिरंगे के लिए सबसे महत्वपूर्ण आधार बना।
आज जिस तिरंगे को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में जाना जाता है, उसे संविधान सभा ने 22 जुलाई 1947 को औपचारिक रूप से अपनाया। इसमें चरखे की जगह अशोक चक्र को स्थान दिया गया। सफेद पट्टी के बीच गहरे नीले रंग का अशोक चक्र सारनाथ के सिंह स्तंभ के धर्मचक्र से लिया गया है और इसमें 24 तीलियां हैं।
इस तरह भारतीय तिरंगे का सफर केवल रंगों और प्रतीकों में बदलाव की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय चेतना के विकास की कहानी भी है। 1906 के शुरुआती ध्वज से लेकर 1947 में अपनाए गए वर्तमान तिरंगे तक का सफर बताता है कि राष्ट्रीय ध्वज ने स्वतंत्रता की लड़ाई के विभिन्न चरणों को अपने भीतर समेटा है। आज तिरंगा देश की संप्रभुता, एकता, गौरव और करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं का प्रतीक है।


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