@विनोद भगत
सोशल मीडिया के दौर में स्ट्रीट फोटोग्राफी केवल एक कला नहीं रही, बल्कि लोकप्रिय कंटेंट का बड़ा माध्यम बन चुकी है। इंस्टाग्राम, फेसबुक, एक्स (ट्विटर) और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर रोज़ाना लाखों तस्वीरें अपलोड होती हैं। इनमें से कई तस्वीरें कुछ ही घंटों में हजारों लाइक्स, शेयर और कमेंट्स बटोर लेती हैं। लेकिन इन तस्वीरों की चमक के पीछे एक ऐसा सवाल लगातार उठ रहा है, जिस पर अब भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में गंभीर बहस हो रही है—क्या स्ट्रीट फोटोग्राफी के नाम पर गरीबों की जिंदगी को कंटेंट बनाकर उनकी गरीबी बेची जा रही है?
भारतीय फोटोग्राफी समुदाय में भी यह मुद्दा तेजी से चर्चा का विषय बन चुका है। अक्सर सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरें दिखाई देती हैं जिनमें किसी बुजुर्ग मजदूर के चेहरे की गहरी झुर्रियां, धूल में खेलते बच्चे, सड़क किनारे बैठे बुजुर्ग, रिक्शा खींचते श्रमिक या फुटपाथ पर सोते लोग कैमरे में बेहद नाटकीय अंदाज में कैद किए जाते हैं। इन तस्वीरों को ब्लैक-एंड-व्हाइट या हाई-कॉन्ट्रास्ट इफेक्ट देकर भावनात्मक कैप्शन लिखे जाते हैं, जैसे—”Hard Life”, “Real India”, “Faces of Poverty” या “Incredible India”। ऐसी तस्वीरें लोगों की सहानुभूति तो बटोरती हैं, लेकिन यह सवाल भी खड़ा करती हैं कि आखिर इनसे सबसे ज्यादा फायदा किसे होता है?
इसी प्रवृत्ति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘पॉवर्टी पोर्न’ (Poverty Porn) कहा जाता है। इसका आशय ऐसी तस्वीरों, वीडियो या कंटेंट से है जिसमें किसी व्यक्ति की गरीबी, लाचारी या संघर्ष को इस तरह प्रस्तुत किया जाए कि दर्शकों में भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा हो, लेकिन उस प्रस्तुति का लाभ मुख्य रूप से कंटेंट बनाने वाले को मिले। सोशल मीडिया पर लोकप्रियता, फॉलोअर्स, पुरस्कार, प्रदर्शनियां और व्यावसायिक अवसर अक्सर फोटोग्राफर के हिस्से में आते हैं, जबकि तस्वीर का विषय बना व्यक्ति वहीं का वहीं रह जाता है।
इस बहस का सबसे संवेदनशील पहलू सहमति (Consent) और शक्ति का असंतुलन (Power Imbalance) है। कैमरे के पीछे खड़ा व्यक्ति अक्सर तकनीक, सोशल मीडिया और अभिव्यक्ति के साधनों से लैस होता है, जबकि तस्वीर में मौजूद व्यक्ति अपनी रोज़मर्रा की जीविका के संघर्ष में लगा होता है। कई बार उसे यह तक नहीं पता होता कि उसकी तस्वीर किस उद्देश्य से ली जा रही है, वह इंटरनेट पर कहाँ प्रकाशित होगी या उससे किसी को आर्थिक या सामाजिक लाभ मिलेगा। ऐसे में बिना अनुमति किसी की तस्वीर लेना और उसे व्यापक रूप से साझा करना उसकी निजता और सम्मान दोनों पर सवाल खड़े करता है।
भारत में सार्वजनिक स्थानों पर फोटोग्राफी करना सामान्य रूप से वैध माना जाता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर तस्वीर नैतिक रूप से भी उचित हो। वर्ष 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसले में निजता (Privacy) को भारतीय संविधान के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया था। यह निर्णय इस बात की याद दिलाता है कि कानून से परे भी नागरिकों की गरिमा और व्यक्तिगत सम्मान की रक्षा करना हर व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी है। सार्वजनिक स्थान पर मौजूद व्यक्ति भी अपनी गरिमा और मानवीय सम्मान का अधिकार रखता है।
हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि पूरी स्ट्रीट फोटोग्राफी को गलत नहीं ठहराया जा सकता। दुनिया के अनेक महान फोटोग्राफरों ने कैमरे के माध्यम से समाज की सच्चाइयों को सामने लाकर इतिहास को दस्तावेज़ों में बदला है। कई तस्वीरों ने सामाजिक बदलाव की शुरुआत की, सरकारों को कार्रवाई के लिए मजबूर किया और आम लोगों को उन वास्तविकताओं से परिचित कराया जिन्हें वे कभी देख नहीं पाते। इसलिए समस्या कैमरे में नहीं, बल्कि कैमरे के पीछे खड़े व्यक्ति की सोच और उद्देश्य में है।
यदि किसी तस्वीर का मकसद किसी व्यक्ति की गरिमा को बनाए रखते हुए उसकी वास्तविक कहानी बताना है, उसकी मेहनत, संघर्ष, उम्मीद और आत्मसम्मान को सामने लाना है, तो वह तस्वीर समाज के लिए प्रेरणा बन सकती है। लेकिन यदि तस्वीर केवल फटे कपड़ों, थके चेहरे और बेबसी को दिखाकर दर्शकों की भावनाओं का इस्तेमाल करती है, तो वह संवेदनशील पत्रकारिता या कला नहीं, बल्कि मानवीय परिस्थितियों का व्यावसायिक उपयोग बन जाती है।
फोटोग्राफी के क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि संवेदनशील स्ट्रीट फोटोग्राफी की शुरुआत सम्मान से होती है। यदि परिस्थितियाँ अनुमति दें तो तस्वीर लेने से पहले व्यक्ति से अनुमति मांगना, मुस्कुराकर संवाद करना और उसके निर्णय का सम्मान करना सबसे बेहतर तरीका है। यदि कोई व्यक्ति मना कर दे तो कैमरा नीचे कर देना ही वास्तविक पेशेवर नैतिकता है। इसी तरह तस्वीर के साथ केवल गरीबी नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की पहचान, उसका काम, उसका आत्मविश्वास और उसका मानवीय पक्ष भी सामने लाना चाहिए।
सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। किसी तस्वीर पर लाइक या शेयर करने से पहले यह सोचना आवश्यक है कि क्या हम उस व्यक्ति की कहानी को समझ रहे हैं या केवल उसकी मजबूरी को मनोरंजन या भावनात्मक कंटेंट के रूप में देख रहे हैं। डिजिटल युग में दर्शक भी उतने ही जिम्मेदार हैं जितना कि कंटेंट बनाने वाला।
अंततः हर फोटोग्राफर को अपने कैमरे का बटन दबाने से पहले स्वयं से एक प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए—यदि मैं इस व्यक्ति की जगह होता, तो क्या मैं चाहता कि मेरी ऐसी तस्वीर बिना मेरी अनुमति के लाखों लोग देखें, उस पर टिप्पणी करें और उसे साझा करें?
यदि इस प्रश्न का उत्तर ‘नहीं’ है, तो शायद तस्वीर लेने से पहले एक बार रुकना चाहिए।
कला का उद्देश्य केवल सुंदर तस्वीरें बनाना नहीं, बल्कि समाज को अधिक संवेदनशील बनाना भी है। स्ट्रीट फोटोग्राफी तब सबसे प्रभावशाली होती है जब वह किसी इंसान की गरिमा को सुरक्षित रखते हुए उसकी वास्तविक कहानी दुनिया तक पहुँचाए। लेकिन यदि किसी की गरीबी, बेबसी और संघर्ष केवल लाइक्स, फॉलोअर्स और प्रसिद्धि का साधन बन जाए, तो यह कला नहीं, बल्कि संवेदनाओं का व्यापार बन जाता है। आज आवश्यकता ऐसे कैमरों की नहीं जो केवल अभाव देखें, बल्कि ऐसी दृष्टि की है जो हर चेहरे में सम्मान, आत्मसम्मान और इंसानियत को पहचान सके।
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