@शब्द दूत ब्यूरो (22 सितंबर 2026)
काशीपुर। डिजिटल युग में बच्चों के बीच मोबाइल और स्क्रीन के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर समाजसेविका एवं डी बाली ग्रुप की डायरेक्टर उर्वशी दत्त बाली ने अभिभावकों से डर या दबाव के बजाय समझदारी और पारिवारिक अनुशासन के साथ स्क्रीन टाइम निर्धारित करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि बच्चों को तकनीक से पूरी तरह दूर रखना आज के समय में संभव नहीं है, क्योंकि पढ़ाई, संवाद और मनोरंजन के लिए डिजिटल माध्यम जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में जरूरत बच्चों को मोबाइल से काटने की नहीं, बल्कि उसके इस्तेमाल की स्पष्ट और स्वस्थ सीमा तय करने की है।
उर्वशी दत्त बाली ने अपने निजी अनुभव को साझा करते हुए बताया कि कोविड काल में ऑनलाइन कक्षाओं के दौरान उन्होंने अपनी बेटी को पहली बार मोबाइल दिया था। उस समय उन्होंने बेटी के साथ स्पष्ट नियम तय किया कि मोबाइल का इस्तेमाल मुख्य रूप से पढ़ाई और निर्धारित समय में गेम खेलने अथवा दोस्तों से बातचीत के लिए किया जाएगा। उन्होंने बताया कि परिवार की दिनचर्या के अनुसार रात 9 से 10 बजे तक मोबाइल इस्तेमाल करने का समय तय किया गया और यह नियम बेटी के अब 16 वर्ष की होने के बावजूद आज भी जारी है। उन्होंने कहा कि रात 10 बजते ही उनकी बेटी स्वयं मोबाइल रख देती है।
उनका कहना है कि प्रत्येक परिवार की दिनचर्या अलग होती है, इसलिए सभी घरों के लिए एक जैसा समय निर्धारित करने के बजाय माता-पिता को अपनी सुविधा और बच्चों की दिनचर्या के अनुसार मोबाइल के लिए प्रतिदिन एक निश्चित घंटा तय करना चाहिए। इससे बच्चों को यह स्पष्ट रहेगा कि मोबाइल इस्तेमाल करने का उनका समय निश्चित है और उन्हें पूरे दिन फोन के लिए जिद करने की जरूरत नहीं होगी। साथ ही माता-पिता और बच्चों के बीच मोबाइल को लेकर होने वाली अनावश्यक बहस और तनाव भी कम किया जा सकता है।
उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि बच्चों को गेम खेलने और दोस्तों से बातचीत करने की जरूरत हो सकती है, लेकिन इसके लिए सीमाएं तय होना भी उतना ही जरूरी है। जब बच्चे पहले से जानते होंगे कि उन्हें मोबाइल कब और कितनी देर इस्तेमाल करना है, तो अनुशासन धीरे-धीरे उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन सकता है। उन्होंने अभिभावकों से आग्रह किया कि वे स्वयं भी बच्चों के सामने मोबाइल इस्तेमाल को लेकर संतुलित व्यवहार का उदाहरण प्रस्तुत करें।
परवरिश में माता-पिता की भूमिका पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि अनुशासन की जिम्मेदारी केवल पिता की नहीं होनी चाहिए। विशेष रूप से मां की बच्चों की दिनचर्या और व्यवहार में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उन्होंने कहा कि माताओं को बच्चों के अनुशासन से जुड़े मामलों में अपनी जिम्मेदारी स्वयं निभानी चाहिए और हर छोटी बात के लिए यह कहकर जिम्मेदारी टालने से बचना चाहिए कि ‘पापा आएंगे तब बताऊंगी।’ उनके अनुसार बच्चे के साथ संवाद, स्नेह और अनुशासन का संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
हाल ही में हल्द्वानी में मोबाइल छुड़ाने के नाम पर बच्चे की आंखों पर पट्टी बांधकर नकली खून दिखाने के सामने आए प्रकरण की निंदा करते हुए उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि बच्चों को डराकर मोबाइल छुड़ाने का तरीका उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि बच्चे बेहद संवेदनशील होते हैं और उन्हें भय दिखाने के बजाय प्यार, संवाद और समझ के माध्यम से मोबाइल के सही इस्तेमाल के बारे में समझाया जाना चाहिए। उनके अनुसार डर आधारित तरीके से बच्चे और माता-पिता के बीच विश्वास का संबंध प्रभावित हो सकता है।
उन्होंने कहा कि लगातार और अनियंत्रित स्क्रीन इस्तेमाल को लेकर अभिभावकों को सतर्क रहने की जरूरत है। बच्चों की उम्र, पढ़ाई, नींद, खेलकूद, सामाजिक गतिविधियों और परिवार के साथ समय को ध्यान में रखते हुए स्क्रीन टाइम तय किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मोबाइल के इस्तेमाल पर अनुशासन का अर्थ बच्चों को तकनीक से पूरी तरह अलग करना नहीं, बल्कि उन्हें तकनीक का जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल करना सिखाना है।
उर्वशी दत्त बाली ने स्कूलों की भूमिका पर भी जोर देते हुए कहा कि बच्चों को कक्षा स्तर पर भी मोबाइल के संतुलित इस्तेमाल के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। यदि स्कूल और परिवार मिलकर बच्चों को यह समझाएं कि मोबाइल मनोरंजन और संवाद का साधन है, लेकिन इसके लिए एक निश्चित समय होना चाहिए, तो बच्चों में स्वयं अनुशासन विकसित करने में मदद मिल सकती है।
उन्होंने सभी अभिभावकों से अपील की कि वे अपने-अपने परिवार की दिनचर्या के अनुसार बच्चों के लिए मोबाइल का प्रतिदिन एक निश्चित घंटा तय करें और इस नियम का पालन घर के सभी सदस्य मिलकर करें। उनका कहना है कि डराने के बजाय संवाद, रोक लगाने के बजाय स्पष्ट सीमा और डांट के बजाय अनुशासन के साथ बच्चों को डिजिटल दुनिया के लिए तैयार करना समय की जरूरत है।
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