@शब्द दूत ब्यूरो (25 जून 2026)
अयोध्या। राम मंदिर निर्माण के लिए सिंधी समाज द्वारा दान की गई 200 किलोग्राम चांदी की ईंटें एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई हैं। विश्व सिंधी सेवा संगम के बैनर तले देश और विदेश से आए सिंधी समाज के प्रतिनिधियों ने भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर निर्माण हेतु यह विशेष दान दिया था। संगठन के अनुसार प्रत्येक चांदी की ईंट पर भगवान झूलेलाल की तस्वीर अंकित थी और इन्हें राम मंदिर के लिए समर्पित किया गया था।
हाल ही में इस दान से जुड़ा एक वीडियो भी सार्वजनिक किया गया है, जिसमें चांदी की ईंटों को अयोध्या ले जाकर समर्पित किए जाने का दावा किया गया है। वीडियो सामने आने के बाद यह मामला फिर सुर्खियों में आ गया है। सिंधी समाज के कुछ प्रतिनिधियों का कहना है कि उन्होंने श्रद्धा से 200 किलो चांदी दान की थी, लेकिन उन्हें इस दान की कोई आधिकारिक रसीद नहीं मिली। इसी कारण अब यह सवाल उठाए जा रहे हैं कि दान में मिली चांदी का उपयोग आखिर किस रूप में किया गया।
रिपोर्टों के अनुसार, दान की गई प्रत्येक ईंट का वजन लगभग एक किलो था। उस समय इसकी कीमत करीब डेढ़ करोड़ रुपये बताई गई थी, जबकि वर्तमान बाजार मूल्य के अनुसार इसकी कीमत कई करोड़ रुपये आंकी जा रही है। सिंधी समाज का दावा है कि चांदी की इन ईंटों को मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार सहित अन्य धार्मिक उपयोगों में लगाए जाने की बात कही गई थी।
वहीं दूसरी ओर, अयोध्या से आई हालिया जानकारी में कहा गया है कि दान में प्राप्त 200 किलो चांदी सुरक्षित है। रिपोर्ट के मुताबिक चांदी को छोटे-छोटे ब्रिक्स के रूप में संरक्षित कर बैंक लॉकर में रखा गया है। साथ ही इससे संबंधित धार्मिक धरोहरों की नियमित पूजा-अर्चना भी की जा रही है। इस जानकारी के सामने आने के बाद उन अटकलों पर विराम लगाने की कोशिश की गई है, जिनमें चांदी के गायब होने या हेरफेर की बातें कही जा रही थीं।
हालांकि, दान की गई चांदी के उपयोग और उसके रिकॉर्ड को लेकर पारदर्शिता की मांग अब भी जारी है। सिंधी समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि वे केवल यह जानना चाहते हैं कि उनके द्वारा श्रद्धापूर्वक समर्पित की गई चांदी का वर्तमान स्वरूप क्या है और उसका उपयोग किस प्रकार किया गया है।
इस बीच मामला सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गया है और सोशल मीडिया पर जारी वीडियो के बाद दान, रिकॉर्ड और पारदर्शिता को लेकर बहस तेज हो गई है। संबंधित पक्षों की ओर से स्थिति स्पष्ट किए जाने की मांग भी उठ रही है। दर असल इस सारे विवाद की जड़ में दान की आधिकारिक रसीद न होना है। आखिर क्यों इस दान की आधिकारिक रसीद नहीं दी गई थी? हालांकि इतने समय बाद सिंधी समाज को एकाएक रसीद का ध्यान क्यों आया? क्या हाल ही में राम मंदिर में चढ़ावे की रकम की कथित चोरी से इसका कोई संबंध है?
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