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आओ मतदाताओं आओ ,कलींदा खाओ@राकेश अचल

राकेश अचल,
वरिष्ठ पत्रकार जाने माने आलोचक

नेताओं के हास्यास्पद बयान सुनकर अब हंसने का मन हो रहा है। खुश रहने के लिए हंसना जरूरी है ,तभी तो शब्द युग्म बना है हंसी-ख़ुशी। हंसी कभी अकेली नहीं रहती । उसे या तो हंसी चाहिए या फिर राजी। राजी-ख़ुशी शब्द युग्म भी रजामंदी से बना लगता है। बना है या नहीं ये तो भाषाविज्ञानी जानें ,हम अज्ञानी तो केवल कयास लगा सकते हैं। और कयास ही लगाते हुए पांच क्या, दस साल गुजार देते हैं कि शायद ‘ अच्छे दिन आएं,शायद बैंक खाते में पंद्रह लाख रूपये आएं। शायद मोशा सचमुच सहाय हो जाएँ !

बहरहाल आज मैं नेताओं पर नहीं मतदाताओं पर लिख रहा हूँ। मतदाता भले ही पांच किलो मुफ्त अन्न पर गुजर करता हो,भले ही उसके खाते में लाड़ली लक्ष्मी या लाड़ली बहन या सीमांत किसान होने के नाते सरकार कुछ न कुछ नगद डालती हो लेकिन उसके हाथ में एक और अनमोल चीज है ,जिसे आम भाषा में ‘वोट’ कहते हैं। ” वोट ‘ शब्द भले ही अंग्रेजी का हो लेकिन वो हिंदी ,उर्दू, मराठी ,पंजाबी समेत तमाम भाषाओँ में ऐसे घुल-मिल गया है जैसे कि दूध में मिश्री मिल जाती है। मिश्री भी धागे वाली मिश्री। लेकिन हमारा वोटर अन्नदाता न होते हुए भी दाता है। उसे सम्मान से मतदाता कहा जाता है। यानि उसके पास भी ईश्वर की तरह देने के लिए कुछ तो है ! अकेले भीख का कटोरा ही उसकी पहचान नहीं है।
देश में जैसे अन्नदाता फटेहाल है ,पामाल है ,आंदोलनरत है । लाठियां खाता है ,अश्रुगैस पीता है। राह में बिछाए जाने वाले काँटों पर चलता है।

उसके लिए रेड कार्पेट कौन बिछाता है ? यही हाल मतदाता का भी है ।मतदाता के हिस्से में वो सब है जो अन्नदाता के हिस्से में है और किसी भी जनसेवक के हिस्से में नहीं है। दरअसल मतदाता ही अन्नदाता है और अन्नदाता ही मतदाता। दोनों को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। कर भी दीजिये तो वो वक्त आने पर एक हो जाता है। मतदाता जब हड़ताल करके भी कामयाब नहीं होता तो उदासीन हो जाता है। दान करना भूल जाता है।

इस समय देश में अठारहवीं लोकसभा के लिए मतदान चल रहा है । दो चरण पूरे हो गए हैं ,लेकिन देश के मतदाताओं ने नेताओं को निराश कर दिया है कम मतदान करके।नेताओं और सरकार को खुश करने कि लिए केंचुआ ने बड़ी कस-बल लगाकर मतदान का प्रतिशत बढ़ाया है। लेकिन कैसे बढ़ाया है ये केंचुआ जानता है या उसकी मशीनें। बात हो रही थी कि मतदाता आखिर अपने मत का [ वोट का ] दान करने को लेकर इतना उदासीन क्यों है जबकि उसके लिए हमारी राष्ट्रवादी सरकार दिन-रात मेहनत कर रही है । यहां तक कि उसने संसद को भी ध्वनिमत से चलकर दिखा दिया। मंदिर बना दिया, प्राण -प्रतिष्ठा करा दी । फोकट में अन्न दे दिया। अब क्या सरकार की जान लेना चाहता है मतदाता ?

कम मतदान से सब परेशान है। सबसे ज्यादा सत्तारूढ़ दल और मोशे की जोड़ी परेशान है। अपनी पार्टी के पार्षदों,विधायकों और मंत्रियों तथा मुख्यमंत्रियों तक को धमका रही है कि यदि तीसरे चरण में मतदान का प्रतिशत न बढ़ा तो उनकी खैर नहीं। कम मतदान को लेकर गनीमत है कि मोशा की जोड़ी ने फिलवक्त मतदाताओं के कान नहीं खींचे। वरना इस जोड़ी का क्या भरोसा ! मतदान न करने पर मतदाताओं की उठ्ठक-बैठक करा दे। मतदान का प्रतिशत बढ़वाने के लिए केंचुए ने कितना पैसा पानी की तरह बहाया ? जिलों का प्रशासन क्या-क्या ठठकर्म नहीं कर रहा ? बस किराये में छूट, रस्सा खींच प्रतियोगिता,चिड़ियाघरों में आधे दाम पर प्रवेश ,रैलियां ,शपथग्रहण समारोह। सब तो हो रहा है लेकिन मतदाता है कि जागने के लिए तैयार नहीं है जबकि मतदाता को चाहिए कि वो मुक्तहस्त से मतदान करे।

मेरा सुझाव तो ये है कि केंचुआ को आदर्श आचार संहिता को बलाए ताक रखकर मौसम को देखते हुए राजनीतिक दलों को ये छूट देना चाहिए कि वे मतदाताओं को घर से बूथ तक लाने-ले जाने के लिए वातानुकूलित वाहन उपलब्ध करा सके । मतदाताओं को कलींदा,आइसक्रीम खिला सकें। बाल-बच्चों को मुफ्त अन्न की तरह मुफ्त टाफियां बाँट सकें।सरकार चाहे तो मतदान को आधार कार्ड से भी लिंक करा सकती है और शर्त लगा सकती है कि जो बन्दा मतदान नहीं करेगा उसे कोई भी सरकारी सहायता नहीं मिलेगी। न फ्री का राशन ,न किसी लाड़ली बहना या लक्ष्मी को फ्री का वायना। आप मानें या न माने देश के मतदाता को फ्री -फंड यानि मुफ्तखोरी की लत लग चुकी है। मतदाता सब कुछ फ्री में चाहता है। बिजली फिर,राशन फ्री,शिक्षा फ्री,घर फ्री। यहाँ तक कि मंगलसूत्र और उसे पहनने वाली भी फ्री। आखिर सरकार ये अब कैसे करे। कर भी दे तो सर्वोच्च न्यायालय का क्या भरोसा कि वो इस फ्रीविज को भी इलेक्टोरल बांड की तरह असंवैधानिक घोषित नहीं करेगी !

मेरा देश के मतदाताओं से अनुरोध है कि वे उदासीनता त्यागें और झूरकर मतदान करें ,यानि शेष पांच भाँवरें ऐसी डालें कि मजा आ जाये । मतदाताओं को ये धारणा भी तोड़ना चाहिए कि अधिक मतदान से ही सत्ता पक्ष को लाभ होता है। या सरकार बरकरार रहती है। ये मिथक है या हकीकत ये तभी पता चलेगा जब अधिक मतदान से देश में सत्ता परिवर्तन हो। परिवर्तन ही प्रगति का आधार है। अब मान लीजिये कि यदि मौसम न बदले तो क्या हो ? इसीलिए यदि एक सरकार दस साल बाद भी न बदले तो क्या होगा ,इसकी कल्पना भी मतदाता को करना चाहिए। हमारे बुजुर्ग कहते थे कि रोटी हो या घोड़े की जीन हमेशा बदलते रहना चाहिए अन्यथा तकलीफ हो सकती है। तो आइये कि इससे पहले की सरकार आपको सूली पर लटकाये या आपके पीछे भी ईडी ,सीबीआई या पुलिस भेजे ,आप घर से निकलिए और जमकर मतदान कीजिये । अपनी पसंद के प्रत्याशी को ,पार्टी को वोट दीजिये और यदि कोई मनमाफिक न हो तो नोटा का बटन दबाइये,लेकिन घर से निकलिए ,अन्यथा लोकतंत्र का नुक्सान होगा । आपको भविष्य में जली हुई रोटी खाना ही लिखा हो तो बात और है ?
@ राकेश अचल
achalrakesh1959@gmail.com

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