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रामनगर :उत्तराखंड में ईको सेंसेटिव जोन को बरबाद करने की बड़ी साजिश, चंद पैसों की खातिर ईको सेंसेटिव जोन में हो रही अवैध प्लाटिंग, पढ़ें एक्सक्लूसिव रिपोर्ट

@शब्द दूत ब्यूरो (31 जुलाई 2022)

वन अधिनियम और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के प्रावधानों के चलते उत्तराखंड में जहां स्थानीय लोग अपनी खुद की जमीन पर कोई काम नहीं कर पा रहे हैं और पलायन करने को मजबूर हैं । वहीं देश व दुनिया से तमाम लोग वन क्षेत्र के आसपास धड़ल्ले से प्लॉट खरीद रहे हैं।

दिल्ली व अन्य शहरों के लोगों ने इलाके की पारिस्थितिकी को बदलते हुए धड़ल्ले से प्रोपर्टी डीलिंग का धंधा कर रहे हैं। डीलरों ने बेशकीमती दामों पर जमीन बेचकर पर्यावरण असंतुलन की स्थिति पैदा कर दी है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को ताक पर रखकर बनाए गए रिसार्ट प्रॉपर्टी डीलरों की कहानी बयां करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक संरक्षित जंगल के इको सेंसेटिव जोन का दायरा एक किलोमीटर होना चाहिए। इसके अलावा शीर्ष अदालत के निर्देश हैं कि ईको सेंसेटिव जोन में कोई भी स्थाई निर्माण कार्य नहीं होगा। कोर्ट ने ये भी कहा है कि नेशनल वाइल्ड लाइफ सेंचुरी और नैशनल पार्क में कोई खनन कार्य नहीं होगा। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि अगर कहीं भी मौजूदा ईको सेंसेटिव जोन का दायरा एक किलोमीटर से ज्यादा है या किसी सेंचुरी में इससे ज्यादा लिमिट है तो ऐसी परिस्थिति में ऐसे ही बाउंड्री प्रभावी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश जारी किया है कि राज्यों के चीफ वन संरक्षक ईको सेंसेटिव जोन के बारे में रिपोर्ट पेश करें।

राष्ट्रीय उद्यान व वन्यजीव विहार के पारिस्थितिकीय तंत्र को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से उनके चारों तरफ के क्षेत्र को चिह्नित कर ईको सेंसिटिव जोन घोषित किया जाता है। इसके तहत संबंधित क्षेत्र में वाणिज्यिक खनन, मिल, उद्योग, जल विद्युत परियोजनाएं, लकड़ी का व्यवसायिक उपयोग जैसी गतिविधियां निषिद्ध की जाती हैं। इसके अलावा पेड़ कटान, होटल-रिसार्ट की स्थापना, पानी का व्यवसायिक उपयोग, कृषि प्रणाली में परिवर्तन, सड़कों का चौड़ीकरण जैसी गतिविधियों को विनियमित श्रेणी में रखा जाता है।

अगर धरातल पर देखा जाए तो चंद जमीन के धंधेबाजों ने अपने लाभ के लिए वन क्षेत्र के आसपास की जमीन को स्थानीय लोगों से औने-पौने दामों पर खरीदकर दिल्ली, मुंबई, गुजरात व दुबई तक के लोगों को बेचकर राज्य के हरित और वन्य जीवों के लिए आरक्षित जंगलों के किनारे कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए हैं और तमाम प्रतिबंधों के बावजूद शांत और सुंदर प्राकृतिक परिदृश्य को नष्ट कर दिया है।

इसमें जिम कार्बेट पार्क के आसपास के इलाके के अलावा बैलपड़ाव व छोई क्षेत्र में हनुमान धाम के आसपास भी शामिल हैं जहाँ प्रापर्टी डीलरों ने नियम विरुद्ध निर्माण कार्य धड़ल्ले से आरंभ कर दिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कौन हैं वह लोग जो उत्तराखंड के पारिस्थितिकी संतुलन के लिए खतरा बन रहे हैं? इस सवाल का जबाव ढूंढना होगा। कुछ स्थानीय लोग भी जाने अनजाने इस षड्यंत्र में शामिल हो गए हैं। चंद पैसों की खातिर अपने ही राज्य की भूमि को दिल्ली व अन्य बड़े शहरों के बिल्डर्स को बेचकर राज्य के साथ विश्वासघात कर रहे हैं।

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