ऐसा लगता है कि उत्तराखंड के आगामी विधानसभा चुनाव में केदारनाथ धाम की बड़ी भूमिका रहने वाली है। दोनों राष्ट्रीय दलों ने अपनी गतिविधियां पवित्र केदारनाथ धाम से शुरू कर दी है।
@विनोद भगत
(02 नवंबर, 2021)
उत्तराखंड की सियासत में बड़ी शिद्दत से यह प्रश्न तैर रहा है कि क्या उत्तराखंड के आगामी विधानसभा चुनाव में केदारनाथ धाम बड़ी भूमिका रहने वाली है। फिलहाल, दोनों ही राष्ट्रीय दलों ने अपनी गतिविधियां पवित्र केदारनाथ धाम से शुरू कर दी है। जहाँ भाजपा के नेताओं का वहाँ पहुंचने पर विरोध तेज हो गया है वहीं कांग्रेस के नेताओं ने भी केदारनाथ धाम को लेकर सियासी पारी खेलनी शुरू कर दी है।
पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता त्रिवेंद्र सिंह रावत का केदारनाथ पहुंचने पर जिस तरह से विरोध हुआ उससे कांग्रेस उत्साहित है और सत्ता में वापसी की जमीन तैयार कर रही है। कुछ दिन पूर्व हरीश रावत स्वयं केदारनाथ के दर्शन कर आए थे। लेकिन आज फिर से पंजाब के मुख्यमंत्री चन्नी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सिद्धू के साथ बाबा केदार के दर्शनों को जाना कुछ और ही संकेत दे रहा है।
दरअसल, भाजपा भी पांच नवंबर को प्रधानमंत्री मोदी की केदारनाथ यात्रा से माइलेज लेना चाहती थी। लेकिन केदारनाथ के तीर्थ पुरिहितों द्वारा त्रिवेंद्र सिंह रावत के व्यापक विरोध ने पार्टी के मुंह का स्वाद कसैला कर दिया है। अब केदारनाथ की उपलब्धियों को भुनाने का भाजपा का ख्वाब भी धूमिल होता दिखाई दे रहा है। उधर आम आदमी पार्टी के सीएम चेहरा बने रिटायर्ड कर्नल अजय कोठियाल भी केदारनाथ आपदा के बाद किये गये जीर्णोद्धार का स्वयं को शिल्पी बता रहे हैं।
राजनीति के जानकारों का मानना गई कि पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने देवस्थानम बोर्ड गठित करके बैठे-बिठाए गेंद कांग्रेस के पाले में डाल दी है। फिलहाल ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तराखंड में भाजपा का यह कदम आत्मघाती गोल साबित होने जा रहा है। ।




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