@विनोद भगत
किसी महिला का शिक्षित, आत्मनिर्भर, आर्थिक रूप से सक्षम या सत्ता के शीर्ष पदों में शामिल होना इस बात की गारंटी नहीं है कि उसका निजी जीवन भी हर तरह के भय, दबाव और भावनात्मक संघर्ष से मुक्त होगा। उत्तराखंड की कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य की ओर से अपने पति के खिलाफ लगाए गए आरोपों ने इसी कड़वी वास्तविकता पर बहस छेड़ने का अवसर दिया है। जिस मंत्री के कंधों पर महिला सशक्तीकरण और बाल विकास जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी है, उनकी शिकायत में विवाह के बाद कथित धोखे, गाली-गलौज, जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल, मारपीट और धमकियों का जिक्र होना अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।
शिकायत के मुताबिक, रेखा आर्य को विवाह के कुछ समय बाद अपने पति के पूर्व विवाह के बारे में जानकारी मिली। इसके बावजूद उन्होंने परिवार और बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए परिस्थितियों को सहन किया। शिकायत में आगे चलकर कथित दुर्व्यवहार, अपमान और धमकियों का भी उल्लेख किया गया है। इन आरोपों की सच्चाई जांच का विषय है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बहाने उस सामाजिक मनःस्थिति को समझना जरूरी है, जिसमें अनेक महिलाएं अपने साथ हो रहे अन्याय के बावजूद लंबे समय तक चुप रहती हैं।
यह सवाल केवल रेखा आर्य तक सीमित नहीं है। हमारे समाज में अनेक महिलाएं रिश्तों में धोखा, अपमान, मानसिक प्रताड़ना या हिंसा का सामना करने के बावजूद खुलकर विरोध नहीं कर पातीं। इसकी वजह हमेशा कमजोरी नहीं होती। कई बार परिवार टूटने का डर, बच्चों के भविष्य की चिंता, सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक निर्भरता, भावनात्मक लगाव और रिश्तेदारों के दबाव महिलाओं को चुप रहने के लिए मजबूर करते हैं। कुछ महिलाएं यह उम्मीद भी करती रहती हैं कि समय के साथ उनका साथी बदल जाएगा और रिश्ते में सुधार आ जाएगा।
कई बार परिवार बचाने की जिम्मेदारी भी महिला के ही कंधों पर डाल दी जाती है। उसे समझौता करने, बच्चों की खातिर सहने और घर की बात घर में रखने की सलाह दी जाती है। इस सामाजिक सोच में पुरुष के व्यवहार पर सवाल उठाने के बजाय महिला से ही त्याग और सहनशीलता की अपेक्षा की जाती है। यही वह बिंदु है जहां परिवार बचाने की कोशिश और अपने सम्मान तथा सुरक्षा की कीमत चुकाने के बीच का अंतर धुंधला पड़ने लगता है।
सशक्त पद पर होना निजी जीवन में सुरक्षा की गारंटी नहीं
रेखा आर्य का मामला इसलिए विशेष ध्यान खींचता है क्योंकि वह खुद महिला सशक्तीकरण विभाग की जिम्मेदारी संभालती हैं। आम तौर पर माना जाता है कि राजनीतिक प्रभाव, आर्थिक संसाधन और प्रशासन तक पहुंच रखने वाली महिला अपने अधिकारों के लिए आसानी से आवाज उठा सकती है। लेकिन किसी महिला का सार्वजनिक प्रभाव उसके निजी रिश्तों में मौजूद भावनात्मक दबाव या पारिवारिक जटिलताओं को अपने आप समाप्त नहीं कर देता।
यही इस प्रकरण की सबसे बड़ी विडम्बना है। एक ओर सरकार और समाज महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का संदेश देते हैं। दूसरी ओर, जब किसी प्रभावशाली महिला की शिकायत में लंबे समय तक कथित अपमान और प्रताड़ना सहने की बात सामने आती है, तो यह सोचने की जरूरत पैदा होती है कि क्या सशक्तीकरण का अर्थ केवल पद, पैसा और अधिकार हासिल करना है, या इसमें अपने निजी जीवन में सम्मानपूर्वक और भयमुक्त रहने का अधिकार भी शामिल है।
यह भी जरूरी है कि इस मामले को किसी महिला की व्यक्तिगत कमजोरी के रूप में देखने के बजाय उन सामाजिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझा जाए, जो महिलाओं को समझौता करने के लिए प्रेरित या मजबूर करती हैं। किसी महिला का देर से शिकायत करना उसके साथ हुए कथित दुर्व्यवहार को स्वतः झूठा नहीं बनाता, ठीक उसी तरह जैसे शिकायत दर्ज होना आरोपों को स्वतः प्रमाणित नहीं कर देता। निष्पक्ष जांच और साक्ष्य ही किसी कानूनी निष्कर्ष का आधार होने चाहिए।
परिवार बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ महिला की क्यों?
हमारे समाज में विवाह को बचाने के नाम पर महिलाओं से अक्सर असाधारण त्याग की अपेक्षा की जाती है। उनसे उम्मीद की जाती है कि वे अपमान भूल जाएं, परिस्थितियों से समझौता करें और बच्चों की खातिर सब कुछ सह लें। लेकिन यह सवाल बहुत कम पूछा जाता है कि परिवार बचाने की जिम्मेदारी दोनों पक्षों की है तो त्याग और सहनशीलता का बोझ एक ही व्यक्ति पर क्यों डाला जाए?
बच्चों का भविष्य महत्वपूर्ण है, लेकिन जिस घर में लगातार अपमान, भय या हिंसा का माहौल होने का आरोप हो, वहां बच्चों की भावनात्मक सुरक्षा पर भी विचार किया जाना चाहिए। परिवार की एकता तभी सार्थक है, जब उसमें सभी सदस्यों के सम्मान, सुरक्षा और गरिमा की जगह हो।
महिला सशक्तीकरण का असली अर्थ क्या है?
रेखा आर्य से जुड़ा यह प्रकरण महिला सशक्तीकरण की अवधारणा पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत रेखांकित करता है। सशक्तीकरण केवल योजनाएं बनाने, जागरूकता अभियान चलाने या महिलाओं को रोजगार और शिक्षा से जोड़ने तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसका एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि महिला अपने साथ होने वाले अन्याय को पहचान सके, बिना भय के शिकायत कर सके और उसे परिवार तथा समाज की ओर से दोषी ठहराए जाने के बजाय उचित सहायता मिले।
साथ ही, महिलाओं को यह भरोसा भी होना चाहिए कि घरेलू हिंसा, धमकी, अपमान या धोखाधड़ी जैसी शिकायतों पर कानून निष्पक्ष तरीके से काम करेगा। सामाजिक प्रतिष्ठा या सार्वजनिक पद किसी भी शिकायत की जांच में न तो विशेष छूट का आधार होना चाहिए और न ही किसी के प्रति पूर्वाग्रह का।
रेखा आर्य की शिकायत के आरोपों की जांच और संबंधित पक्ष का जवाब सामने आने के बाद ही मामले के तथ्यों पर अंतिम निष्कर्ष निकाला जा सकेगा। लेकिन इस प्रकरण से उठा बड़ा सवाल आज भी हमारे समाज के सामने है—जब एक महिला अपने अधिकारों और सशक्तीकरण की बात करने वाली व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होने के बावजूद निजी रिश्ते में कथित अपमान और धोखे का सामना करने की बात कहती है, तो आम महिलाओं की चुनौतियों को समझने के लिए हमें कितना गंभीर होना चाहिए?
विडम्बना सिर्फ इतनी नहीं कि एक महिला मंत्री ने कथित तौर पर लंबे समय तक सब कुछ सहा। असली विडम्बना यह है कि आज भी हमारे समाज में परिवार बचाने के नाम पर महिला के सहने को गुण और उसके विरोध को समस्या मान लिया जाता है। महिला सशक्तीकरण का वास्तविक उद्देश्य इसी सोच को बदलना होना चाहिए—ताकि किसी भी महिला को अपना सम्मान, सुरक्षा और आत्मसम्मान बचाने के लिए अकेले संघर्ष न करना पड़े।
Shabddoot – शब्द दूत Online News Portal



