@विनोद भगत
उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं और इसी के साथ पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत भी एक बार फिर लगातार सार्वजनिक बयानबाजी करते नजर आ रहे हैं। भाजपा सरकार पर हमले हों, युवाओं और भर्ती परीक्षाओं का सवाल हो या फिर अपने पूर्व ओएसडी चंदन सिंह जीना से जुड़े ईडी प्रकरण पर सफाई—रावत इन दिनों राजनीतिक रूप से काफी मुखर दिखाई दे रहे हैं। हालिया घटनाक्रमों को जोड़कर देखें तो उनकी सक्रियता के केंद्र में एक साथ दो मोर्चे दिखाई देते हैं—भाजपा सरकार को घेरना और अपने राजनीतिक कार्यकाल से जुड़े सवालों का जवाब देना।
सितंबर में चंदन सिंह जीना के ठिकानों पर ईडी की कार्रवाई ने रावत को अचानक राष्ट्रीय और प्रदेश की राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया। ईडी के मुताबिक 2016 की UKSSSC ग्राम पंचायत विकास अधिकारी परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े मामले में तलाशी के दौरान नकदी, सोना और महंगी घड़ियां बरामद की गईं। जीना रावत के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान ओएसडी रहे थे और बाद में उनके निजी सहायक के रूप में भी जुड़े रहे।
कार्रवाई के बाद रावत ने कांग्रेस से अलग होने की बात नहीं कही, बल्कि पार्टी के कुछ पदों से हटने की इच्छा जताई। उन्होंने कहा कि कांग्रेस उनके लिए जीवन का हिस्सा है और वह पार्टी के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को अपने किसी सहयोगी से जुड़े विवाद के कारण कमजोर नहीं होने देना चाहते। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यदि उनके कार्यकाल में किसी गलत काम में उनकी भूमिका साबित होती है तो वह कानून का सामना करने के लिए तैयार हैं।
यहीं से रावत की मौजूदा राजनीतिक भूमिका का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है। वह रक्षात्मक स्थिति में रहने के बजाय अपने बयान को राजनीतिक सवाल में बदलने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं। ईडी कार्रवाई को लेकर कांग्रेस ने भी जांच एजेंसियों के इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर भाजपा नेताओं ने कांग्रेस और रावत से जुड़े राजनीतिक अतीत को लेकर सवाल उठाए हैं। इस तरह जांच की कानूनी प्रक्रिया के साथ-साथ मामला राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय भी बन गया है।
रावत की सक्रियता का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू भाजपा सरकार पर लगातार हमला है। उत्तराखंड की राजनीति में रावत लंबे समय से ऐसे मुद्दों को उठाते रहे हैं जिन्हें वह सीधे आम जनता से जोड़ते हैं। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाएं, पलायन, महंगाई, किसानों की समस्याएं और पहाड़ के विकास जैसे मुद्दे उनके राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं। 2027 के चुनावी माहौल में इन मुद्दों का महत्व स्वाभाविक रूप से बढ़ सकता है।
लेकिन कांग्रेस के भीतर रावत की भूमिका को केवल भाजपा विरोध तक सीमित करके देखना अधूरा होगा। वह उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे अनुभवी नेताओं में हैं और 2014 से 2017 तक मुख्यमंत्री रहे हैं। इसलिए जब वह सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हैं तो उनके बयान वर्तमान राजनीति के साथ-साथ उनके अपने राजनीतिक रिकॉर्ड से भी तुलना पैदा करते हैं।
यही वजह है कि ईडी कार्रवाई के बाद उनके द्वारा अपने पार्टी पदों से हटने की पेशकश भी सामान्य राजनीतिक बयान नहीं मानी गई। उनके इस कदम की अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं सामने आईं। कुछ विश्लेषणों में इसे आत्मरक्षात्मक कदम बताया गया, जबकि रावत के अपने बयानों में इसका कारण कांग्रेस के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को किसी तरह की कमजोरी से बचाना बताया गया है।
दिलचस्प बात यह है कि पदों से हटने की पेशकश के बावजूद रावत ने सक्रिय राजनीतिक संवाद से दूरी नहीं बनाई। यही तथ्य उनकी वर्तमान भूमिका को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। यदि कोई वरिष्ठ नेता संगठनात्मक पद छोड़ने की बात करता है लेकिन उसी समय सरकार और राजनीतिक मुद्दों पर लगातार मुखर रहता है तो इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि उसकी राजनीतिक सक्रियता संगठनात्मक पद से अलग एक स्वतंत्र राजनीतिक भूमिका में जारी रहने वाली है।
2027 के संदर्भ में कांग्रेस के लिए रावत की सक्रियता का एक और पहलू महत्वपूर्ण है। पार्टी को सरकार के खिलाफ मुद्दे उठाने के साथ-साथ अपनी पिछली सरकार और अपने नेताओं से जुड़े सवालों का भी जवाब देना होगा। रावत के हालिया बयानों में यही दोनों चीजें साथ-साथ दिखाई दे रही हैं। वह भाजपा से सवाल पूछ रहे हैं और साथ ही अपने कार्यकाल से जुड़े सवालों पर सार्वजनिक सफाई भी दे रहे हैं।
ईडी प्रकरण ने इस राजनीतिक संवाद को और तीखा कर दिया है। जांच एजेंसी की कार्रवाई का अंतिम कानूनी परिणाम अभी सामने आना बाकी है, इसलिए किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी को केवल तलाशी या बरामदगी के आधार पर अंतिम रूप से तय नहीं किया जा सकता। लेकिन राजनीतिक स्तर पर इस कार्रवाई ने 2016 की भर्ती प्रक्रिया और तत्कालीन सरकार की भूमिका को फिर से बहस में ला दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम में हरीश रावत की राजनीति का एक पुराना पैटर्न भी दिखाई देता है—विवाद के बीच सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखना और मुद्दे को व्यापक राजनीतिक बहस से जोड़ना। यही कारण है कि आने वाले महीनों में रावत की गतिविधियों पर कांग्रेस और भाजपा दोनों की नजर रहना स्वाभाविक है।
हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि 2027 के चुनाव में रावत की व्यक्तिगत भूमिका क्या होगी या कांग्रेस उन्हें किस भूमिका में इस्तेमाल करेगी। फिलहाल तथ्य यह है कि चुनाव से लगभग एक वर्ष पहले वह राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं, भाजपा सरकार पर हमले कर रहे हैं और अपने राजनीतिक अतीत से जुड़े सवालों का सार्वजनिक जवाब भी दे रहे हैं।
उत्तराखंड की राजनीति में 2027 की लड़ाई अभी औपचारिक चुनावी चरण में नहीं पहुंची है, लेकिन मुद्दों की जमीन तैयार होने लगी है। ऐसे में हरीश रावत की सक्रियता कांग्रेस के लिए केवल एक वरिष्ठ नेता की सक्रियता नहीं, बल्कि पार्टी के राजनीतिक विमर्श का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि रावत की आवाज कांग्रेस के व्यापक अभियान से किस तरह जुड़ती है और पार्टी सरकार के खिलाफ किन मुद्दों को चुनावी बहस के केंद्र में लाती है।
फिलहाल इतना जरूर है कि ईडी कार्रवाई के बाद कुछ दिनों के लिए रक्षात्मक दिखाई देने वाले हरीश रावत अब फिर सार्वजनिक राजनीतिक बहस में सक्रिय नजर आ रहे हैं। 2027 की चुनावी राजनीति जैसे-जैसे आकार लेगी, रावत के बयान, उनके मुद्दे और कांग्रेस के भीतर उनकी भूमिका उत्तराखंड की सियासत में लगातार चर्चा का विषय बने रहने की संभावना है।
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