@शब्द दूत ब्यूरो (22 सितंबर 2026)
देहरादून। पछुवा दून और विकासनगर क्षेत्र में सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण कर मस्जिद, मदरसे और ईदगाह बनाए जाने के आरोपों ने एक बार फिर सरकारी भूमि की निगरानी और विभागीय समन्वय पर सवाल खड़े कर दिए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार जिला प्रशासन स्तर पर ऐसे मामलों की जांच की जा रही है, जबकि भूमि के स्वामित्व और निर्माण की वैधता को लेकर राजस्व, सिंचाई, वन विभाग तथा अन्य संबंधित विभागों के अभिलेखों का परीक्षण महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
बताया जा रहा है कि देहरादून जिले के पछुवा दून क्षेत्र में कई धार्मिक संरचनाओं के संबंध में यह शिकायत सामने आई है कि उनका निर्माण ऐसी जमीनों पर हुआ, जिन्हें सरकारी अथवा ग्राम समाज की भूमि बताया जा रहा है। दूसरी ओर, कुछ संपत्तियों को वक्फ संपत्ति बताए जाने के दावे भी सामने आए हैं। ऐसे मामलों में वास्तविक स्थिति राजस्व अभिलेख, भूमि की श्रेणी, स्वामित्व दस्तावेज और संबंधित विभागों की अनुमति की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक विकासनगर परगना क्षेत्र में आइशा मस्जिद, ग्राम कुल्हाल को ग्राम समाज की भूमि पर, कूबा मस्जिद धौला तप्पड़ को वन भूमि पर तथा जामा मस्जिद मटक माजरी और अन्य कुछ धार्मिक स्थलों को सिंचाई विभाग की भूमि से संबंधित बताया जा रहा है। इसी तरह ढकरानी, कुंजा, बरोटीवाला और आसपास के क्षेत्रों में स्थित कुछ मस्जिदों, मदरसों और ईदगाहों को भी सरकारी भूमि पर निर्मित होने का दावा किया गया है। इन दावों की स्वतंत्र राजस्व एवं विभागीय पुष्टि आवश्यक है।
क्षेत्र में बड़ी ईदगाह ढकरानी, ईदगाह बाबूगढ़, ईदगाह लाइन जीवनगढ़, ईदगाह हरबर्टपुर, ईदगाह कुंजा तथा ईदगाह डाक्टरगंज-नवाबगढ़ को लेकर भी भूमि और निर्माण अनुमति से जुड़े सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि इन निर्माणों के लिए संबंधित विभागों से आवश्यक अनुमति या लीज संबंधी प्रक्रिया पूरी नहीं की गई। हालांकि, प्रत्येक मामले में दस्तावेजी स्थिति अलग-अलग हो सकती है और अंतिम निष्कर्ष सक्षम प्रशासनिक अथवा न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही निकाला जा सकता है।
इस पूरे मामले में जिला प्रशासन और मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण यानी एमडीडीए के बीच जिम्मेदारी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। एक ओर जहां सरकारी भूमि पर कब्जे की स्थिति में राजस्व एवं संबंधित भूमि स्वामी विभाग की भूमिका सामने आती है, वहीं निर्माण की अनुमति और भवन संबंधी नियमों के अनुपालन का विषय विकास प्राधिकरण से जुड़ सकता है। इसी कारण ऐसे मामलों में विभागीय समन्वय और संयुक्त सत्यापन की जरूरत बढ़ जाती है।
स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि राजनीतिक संरक्षण के कारण कुछ अतिक्रमण लंबे समय तक कार्रवाई से बचे रहे। हालांकि किसी व्यक्ति अथवा राजनीतिक दल पर संरक्षण देने का आरोप तभी पुष्ट तथ्य माना जा सकता है जब उसके समर्थन में आधिकारिक दस्तावेज, जांच रिपोर्ट या अन्य विश्वसनीय प्रमाण उपलब्ध हों।
विकासनगर क्षेत्र में धार्मिक संरचनाओं की संख्या में वृद्धि और क्षेत्र की जनसांख्यिकी में बदलाव को लेकर भी राजनीतिक एवं सामाजिक बहस होती रही है। ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर जनसंख्या संबंधी दावों की पुष्टि के लिए आधिकारिक जनगणना और प्रमाणित सरकारी आंकड़ों को आधार बनाना आवश्यक है। केवल धार्मिक संरचनाओं की संख्या के आधार पर किसी क्षेत्र के जनसांख्यिकीय बदलाव का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
इस बीच उत्तराखंड वक्फ बोर्ड भी अपनी संपत्तियों पर कथित अतिक्रमण और दुरुपयोग को लेकर जांच की बात कह चुका है। मार्च 2025 में बोर्ड ने राज्य की वक्फ संपत्तियों की विस्तृत जांच का निर्णय लिया था। अप्रैल 2025 में बोर्ड की ओर से उत्तर प्रदेश से पुराने रिकॉर्ड मंगाकर उत्तराखंड के राजस्व अभिलेखों से उनका मिलान करने की बात कही गई थी।
सितंबर 2026 में वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स ने देहरादून समेत राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में वक्फ भूमि और कब्रिस्तानों पर अवैध कब्जों का दावा किया था। उन्होंने आजादनगर क्षेत्र में कब्रिस्तान की जमीन पर कब्जे की बात भी कही थी।
वहीं, देहरादून जिला प्रशासन ने भूमि विवाद और अतिक्रमण से जुड़े मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए विशेष सेल गठित करने की घोषणा भी की है। जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान के अनुसार इस व्यवस्था के तहत भूमि सीमांकन, कब्जे और अन्य राजस्व संबंधी मामलों की निगरानी की जाएगी।
ऐसे में पछुवा दून में सामने आ रहे मामलों में सबसे अहम सवाल यही है कि संबंधित जमीन वास्तव में किस विभाग या संस्था के नाम दर्ज है, निर्माण के समय क्या अनुमति ली गई थी और वर्तमान में भूमि का राजस्व रिकॉर्ड क्या कहता है। यदि किसी सरकारी भूमि पर बिना अनुमति कब्जा अथवा निर्माण प्रमाणित होता है तो नियमानुसार कार्रवाई का रास्ता खुलता है। वहीं यदि किसी संपत्ति पर वक्फ का वैध दावा है तो उसके समर्थन में उपलब्ध मूल दस्तावेज और राजस्व अभिलेखों का मिलान आवश्यक होगा।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी भूमि, धार्मिक संपत्तियों और अतिक्रमण से जुड़े विवाद सामाजिक रूप से संवेदनशील होते हैं। ऐसे मामलों में प्रशासन के लिए पारदर्शी जांच, दस्तावेजों का सार्वजनिक परीक्षण और कानून के अनुसार समान कार्रवाई ही विवादों के स्थायी समाधान का आधार बन सकती है।
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