@विनोद भगत
भारत को लंबे समय तक कृषि प्रधान देश कहा जाता रहा है। गांव, किसान, खेत और खेती भारतीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन की पहचान रहे हैं। देश की बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर रही है। लेकिन आज भारतीय राजनीति और लोकतांत्रिक विमर्श को देखकर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत धीरे-धीरे कृषि प्रधान देश की पहचान से निकलकर कुर्सी प्रधान देश बनता जा रहा है?
कुर्सी यहां केवल सत्ता की कुर्सी नहीं है। यह उस राजनीतिक मानसिकता का प्रतीक है जिसमें सत्ता हासिल करना, सत्ता बनाए रखना और सत्ता के लिए हर संभव राजनीतिक समीकरण तैयार करना ही राजनीति का सबसे बड़ा उद्देश्य दिखाई देने लगा है। विडंबना यह है कि इस दौड़ में केवल नेता ही शामिल नहीं हैं, बल्कि जनता का एक बड़ा वर्ग भी अपनी वास्तविक समस्याओं से अधिक किसी नेता या दल की कुर्सी बचाने को लेकर चिंतित दिखाई देता है।
लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च होती है। सरकारें जनता के लिए बनती हैं और राजनीतिक दलों का मूल उद्देश्य जनता की समस्याओं का समाधान करना होना चाहिए। लेकिन जब राजनीतिक बहस का केंद्र रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, किसानों की आय, मजदूरों की स्थिति और भ्रष्टाचार के बजाय यह बन जाए कि कौन सत्ता में रहेगा और कौन सत्ता से बाहर जाएगा, तब लोकतंत्र के सामने गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
आज राजनीतिक दलों के समर्थकों के बीच कई बार ऐसी स्थिति दिखाई देती है कि अपने नेता की गलती पर सवाल उठाने के बजाय विरोधी नेता की गलती गिनाना ज्यादा महत्वपूर्ण समझा जाता है। सरकार किसी समस्या में विफल हो तो समर्थक यह साबित करने में लग जाते हैं कि पिछली सरकार उससे भी ज्यादा खराब थी। विपक्ष कोई मुद्दा उठाए तो उसके समर्थक समस्या के समाधान पर चर्चा करने के बजाय यह बताने लगते हैं कि विपक्ष के शासनकाल में क्या हुआ था। इस तरह जनता की समस्या राजनीतिक दलों की आपसी लड़ाई में कहीं पीछे छूट जाती है।
सबसे चिंताजनक स्थिति तब होती है जब गरीबी और अभाव भी राजनीतिक उपलब्धि की तरह प्रस्तुत किए जाने लगें। यदि देश में करोड़ों लोग गरीब हैं, तो यह किसी भी सरकार और समाज के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए। गरीबों की संख्या को लेकर तालियां बजाना या किसी राजनीतिक भाषण में इसे उपलब्धि की तरह स्वीकार कर लेना लोकतंत्र की संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। गरीब होना किसी नागरिक की उपलब्धि नहीं, बल्कि व्यवस्था के सामने खड़ी चुनौती है।
यह सवाल किसी एक राजनीतिक दल या सरकार तक सीमित नहीं है। सत्ता चाहे किसी की भी हो, जनता का काम सरकार की उपलब्धियों पर सवाल करना भी है और उसकी कमियों पर आवाज उठाना भी। लोकतंत्र में अंधसमर्थन उतना ही खतरनाक हो सकता है जितना अंधविरोध। जनता को यह अधिकार ही नहीं बल्कि जिम्मेदारी भी मिली है कि वह अपने प्रतिनिधियों से पूछे कि रोजगार कहां है, महंगाई क्यों बढ़ रही है, सरकारी अस्पतालों की हालत कैसी है, स्कूलों में शिक्षा का स्तर क्या है, किसानों की लागत और आमदनी में कितना अंतर है और भ्रष्टाचार पर वास्तव में कितना नियंत्रण हुआ है।
राजनीति में सत्ता आवश्यक है, क्योंकि सत्ता के माध्यम से नीतियां बनती हैं और उनका क्रियान्वयन होता है। लेकिन सत्ता साधन है, साध्य नहीं। जिस दिन कुर्सी ही राजनीति का अंतिम लक्ष्य बन जाए, उस दिन जनता की समस्याएं राजनीतिक प्राथमिकताओं में पीछे चली जाती हैं। फिर घोषणाएं जनता के लिए कम और चुनावी गणित के लिए ज्यादा होने लगती हैं। योजनाएं नागरिक की जरूरत से अधिक राजनीतिक लाभ के हिसाब से देखी जाने लगती हैं और विकास का मूल्यांकन भी इस आधार पर होने लगता है कि उसका राजनीतिक फायदा किसे मिला।
भारत में आज भी करोड़ों लोग गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई और असमान अवसरों से जूझ रहे हैं। किसानों को मौसम, बाजार, लागत और कर्ज की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। मजदूरों के सामने स्थायी रोजगार और सम्मानजनक आय का संकट है। युवाओं के सामने शिक्षा पूरी करने के बाद रोजगार की चिंता है। मध्यम वर्ग महंगाई और बढ़ते खर्च के बीच अपने भविष्य को लेकर परेशान है। गरीब परिवारों के लिए स्वास्थ्य का एक बड़ा खर्च वर्षों की मेहनत को संकट में डाल सकता है।
इन समस्याओं के बीच राजनीतिक बहस अगर केवल इस बात पर केंद्रित हो जाए कि कौन सा नेता कितना लोकप्रिय है, किस दल की सरकार बनेगी या किसकी कुर्सी सुरक्षित रहेगी, तो यह जनता के साथ न्याय नहीं है।
जनता को भी इस राजनीतिक संस्कृति में अपनी भूमिका पर विचार करना होगा। आखिर नेता वही मुद्दे उठाते हैं जिन पर जनता प्रतिक्रिया देती है। यदि जाति, धर्म, क्षेत्र, व्यक्ति पूजा और दलगत निष्ठा रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएंगे, तो राजनीति भी उन्हीं मुद्दों को प्राथमिकता देगी। राजनीतिक दल जनता की पसंद और प्राथमिकताओं को देखकर अपना एजेंडा बनाते हैं।
इसलिए बदलाव केवल नेताओं से अपेक्षित नहीं होना चाहिए। मतदाता को भी यह तय करना होगा कि चुनाव के समय वह किस आधार पर अपना प्रतिनिधि चुनता है। क्या वह सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल, रोजगार और कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता देता है या केवल इस आधार पर मतदान करता है कि उसका पसंदीदा नेता सत्ता में बना रहे?
लोकतंत्र में किसी नेता का समर्थन करना गलत नहीं है। राजनीतिक विचारधारा से जुड़ना भी गलत नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब समर्थन विवेक को समाप्त कर देता है। लोकतंत्र का सबसे मजबूत नागरिक वह नहीं है जो हर परिस्थिति में अपने नेता के पक्ष में खड़ा रहे, बल्कि वह है जो सही काम पर समर्थन और गलत काम पर सवाल करने का साहस रखता हो।
भारत को वास्तव में फिर से अपनी मूल प्राथमिकताओं की ओर लौटने की जरूरत है। खेत और किसान केवल चुनावी भाषणों का विषय न रहें, बल्कि कृषि को टिकाऊ और लाभकारी बनाने की गंभीर कोशिश हो। युवाओं को केवल सपने न दिखाए जाएं, बल्कि रोजगार के वास्तविक अवसर पैदा किए जाएं। गरीबों को केवल आंकड़ों में न गिना जाए, बल्कि उन्हें गरीबी से बाहर निकालने की ठोस व्यवस्था की जाए। शिक्षा और स्वास्थ्य को राजनीतिक घोषणा नहीं बल्कि नागरिक अधिकारों के स्तर पर देखा जाए।
देश में सरकारें आती-जाती रहेंगी। नेता बदलेंगे, दल बदलेंगे और सत्ता की कुर्सियां भी बदलती रहेंगी। लेकिन देश और जनता स्थायी हैं। किसी भी नेता की कुर्सी देश से बड़ी नहीं हो सकती और किसी भी राजनीतिक दल का अस्तित्व जनता के हित से ऊपर नहीं होना चाहिए।
आज जरूरत इस बात की है कि भारत को फिर से यह याद कराया जाए कि लोकतंत्र में कुर्सी जनता की सेवा का माध्यम है, जनता पर शासन करने का स्थायी अधिकार नहीं। जब जनता अपने नेताओं से सवाल पूछना शुरू करेगी, जब समर्थक अपने ही दल की गलतियों पर आवाज उठाएंगे और जब चुनावी मुद्दों में वास्तविक समस्याएं प्राथमिकता बनेंगी, तभी राजनीति का चरित्र बदलेगा।
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी जनता है। वही जनता नेताओं को सत्ता देती है और वही सत्ता वापस लेने की ताकत भी रखती है। इसलिए जनता को किसी नेता की कुर्सी से ज्यादा अपने बच्चों के भविष्य, अपने परिवार की रोटी, किसान की आय, युवा के रोजगार और देश की व्यवस्था की चिंता करनी होगी।
कुर्सी किसी एक व्यक्ति की नहीं होती। कुर्सी आती-जाती है। लेकिन गरीबी, भूख, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार का असर उस नागरिक के जीवन पर पड़ता है जो हर दिन अपनी मेहनत से देश को आगे बढ़ाता है। इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि किसकी कुर्सी बची रहेगी। असली सवाल यह होना चाहिए कि देश का आम नागरिक कब सुरक्षित, सम्मानजनक और खुशहाल जीवन जी पाएगा?
यदि इस सवाल को राजनीति के केंद्र में वापस नहीं लाया गया, तो हम लोकतंत्र में चुनाव तो लगातार कराते रहेंगे, सरकारें भी बदलते रहेंगे, लेकिन जनता की मूल समस्याएं वहीं खड़ी रहेंगी। और तब सचमुच यह कहना पड़ेगा कि कभी कृषि प्रधान कहलाने वाला देश राजनीति की ऐसी दौड़ में पहुंच गया है, जहां जनता से बड़ी हो गई है—कुर्सी।
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