@शब्द दूत ब्यूरो (01 जून
रुद्रप्रयाग। केदारनाथ यात्रा मार्ग पर घोड़े-खच्चरों की लीद के निस्तारण को लेकर उत्तराखंड सरकार और पर्यटन विभाग की महत्वाकांक्षी योजना पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जिस लीद को पहले निशुल्क उठाया जा रहा था, उसके निस्तारण के लिए सरकार ने 1 करोड़ 43 लाख 61 हजार रुपये का पायलट प्रोजेक्ट स्वीकृत किया, लेकिन चार महीने बीत जाने के बाद भी धरातल पर कोई ठोस काम दिखाई नहीं दे रहा है। परिणामस्वरूप यात्रा मार्ग पर गंदगी का अंबार लगा हुआ है और श्रद्धालुओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
पर्यटन विभाग ने दावा किया था कि घोड़े-खच्चरों की लीद को चीड़ के पिरूल के साथ मिलाकर फायर ब्रिक्स तैयार किए जाएंगे। इन फायर ब्रिक्स का उपयोग केदारनाथ धाम में पानी गर्म करने वाले बॉयलरों को चलाने के लिए किया जाना था, जिससे तीर्थयात्रियों को गर्म पानी उपलब्ध कराया जा सके। इसके लिए 3 फरवरी 2026 को हिमालय इंस्टीट्यूट फॉर इनवायरमेंट इकोलॉजी एंड डेवलपमेंट नामक संस्था को कैबिनेट की मंजूरी के बाद यह पायलट प्रोजेक्ट सौंपा गया।
योजना का व्यापक प्रचार-प्रसार किया गया, लेकिन फरवरी से मई तक का समय बीत जाने के बावजूद प्रस्तावित बॉयलर केदारनाथ नहीं पहुंच सका। इससे यात्रा मार्ग से लीद उठाने का कार्य शुरू नहीं हो पाया और गंदगी लगातार मार्ग पर जमा होती रही। बारिश के दौरान यही अपशिष्ट बहकर मंदाकिनी नदी में मिलने की आशंका भी जताई जा रही है।
जानकारी के अनुसार, पिछले वर्ष जिला प्रशासन के अनुरोध पर पतंजलि योगपीठ द्वारा यात्रा मार्ग से घोड़े-खच्चरों की लीद निशुल्क उठाई जा रही थी। इसके निस्तारण के लिए केदारनाथ में एक केंद्र भी स्थापित किया गया था, जिस पर संस्था ने भवन निर्माण समेत अन्य व्यवस्थाओं में लगभग 50 लाख रुपये से अधिक खर्च किए थे। बताया जाता है कि यह कार्य पूरी तरह सेवा भाव से किया गया और इसके लिए सरकार से किसी प्रकार की आर्थिक सहायता नहीं ली गई।
हालांकि, 10 अप्रैल 2026 को रुद्रप्रयाग के जिला पशुपालन अधिकारी आशीष रावत ने पतंजलि के प्रोजेक्ट पर काम न करने के आरोप लगाते हुए नोटिस जारी कर दिया। उल्लेखनीय है कि इससे पहले फरवरी माह में ही यह कार्य बिना किसी पूर्व सूचना के दूसरी संस्था को सौंपा जा चुका था। इसके बाद पतंजलि योगपीठ ने पशुपालन विभाग और जिला प्रशासन को कानूनी नोटिस भेजते हुए अपने खर्च की भरपाई की मांग की है। सूत्रों के अनुसार इस कानूनी विवाद ने शासन और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है।
इस पूरे मामले में उस संस्था को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं जिसे पर्यटन विभाग ने यह पायलट प्रोजेक्ट सौंपा है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि संस्था की स्थापना कब हुई, इसके संचालक कौन हैं, इसे इतनी जल्दी कैबिनेट से मंजूरी कैसे मिली और अब तक परियोजना पर वास्तविक कार्य क्यों शुरू नहीं हो पाया।
विशेषज्ञों का कहना है कि केदारनाथ यात्रा मार्ग पर प्रतिदिन हजारों घोड़े-खच्चर संचालित होते हैं। अनुमान है कि करीब चार हजार घोड़े-खच्चर लगातार यात्रा मार्ग पर आवाजाही कर रहे हैं, जिससे बड़ी मात्रा में अपशिष्ट उत्पन्न होता है। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) भी इस मुद्दे को लेकर कई बार उत्तराखंड सरकार और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को पत्र लिख चुका है। एनजीटी ने चेतावनी दी है कि घोड़े-खच्चरों की लीद के कारण मंदाकिनी नदी प्रदूषित हो रही है, जिससे जलीय जीवों के अस्तित्व और जल की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि जिस कार्य को पहले सेवा भावना के तहत निशुल्क किया जा रहा था, उसके लिए अब करोड़ों रुपये की परियोजना स्वीकृत होने के बावजूद गंदगी का समाधान क्यों नहीं हो पाया। केदारनाथ यात्रा के चरम सीजन में यह मुद्दा पर्यावरण संरक्षण और प्रशासनिक जवाबदेही दोनों के लिए चुनौती बनता जा रहा है।
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