@विनोद भगत
काशीपुर। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव भले अभी कुछ समय दूर हों, लेकिन काशीपुर में चुनावी सरगर्मियां तेज होने लगी हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल अपने-अपने राजनीतिक समीकरण साधने में जुट गए हैं। टिकट की संभावनाओं, संगठनात्मक गतिविधियों और नेताओं की बढ़ती सक्रियता ने यह संकेत दे दिया है कि चुनावी शतरंज की बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है।
स्थानीय राजनीति में इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पिछले ढाई दशक से लगातार हार का सामना कर रही कांग्रेस इस बार इतिहास बदल पाएगी, या फिर भाजपा एक बार फिर अपनी जीत का सिलसिला कायम रखेगी? इन सवालों पर राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ आम जनता के बीच भी चर्चा तेज हो गई है।
दरअसल, काशीपुर विधानसभा सीट पर भाजपा की सफलता के पीछे केवल पार्टी का संगठन ही नहीं, बल्कि पूर्व विधायक हरभजन सिंह चीमा की चुनावी रणनीति और मजबूत जनाधार को भी प्रमुख कारण माना जाता रहा है। पिछले लगभग 25 वर्षों में हर चुनाव से पहले उनके खिलाफ माहौल बनने, पार्टी के भीतर विरोध होने और हार की भविष्यवाणी किए जाने के बावजूद चुनाव परिणाम हमेशा उनके पक्ष में रहे। इतना ही नहीं, समय के साथ उनकी जीत का अंतर भी बढ़ता गया।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा नेतृत्व भी लंबे समय तक काशीपुर में चीमा परिवार की चुनावी क्षमता पर भरोसा करता रहा है। यही कारण रहा कि जब हरभजन सिंह चीमा ने अपने पुत्र त्रिलोक सिंह चीमा की दावेदारी पेश की तो पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने खुलकर इसका विरोध किया। विरोध के बावजूद पार्टी हाईकमान ने त्रिलोक सिंह चीमा को टिकट दिया और उन्होंने चुनाव जीतकर विरोधियों को जवाब भी दे दिया।
अब एक बार फिर चुनाव नजदीक आते ही वही सवाल सामने खड़ा हो गया है कि क्या इस बार भाजपा चीमा परिवार से इतर किसी नए चेहरे पर दांव लगाएगी, या फिर एक बार फिर उसी परिवार पर भरोसा जताया जाएगा। फिलहाल राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए चीमा परिवार की दावेदारी मजबूत मानी जा रही है।
इधर पिछले साढ़े चार वर्षों तक अपेक्षाकृत सीमित राजनीतिक सक्रियता के बाद विधायक त्रिलोक सिंह चीमा की सार्वजनिक गतिविधियों में अचानक तेजी आई है। विभिन्न कार्यक्रमों में उनकी बढ़ती मौजूदगी और जनसंपर्क अभियान ने राजनीतिक चर्चाओं को नया बल दे दिया है। इससे यह कयास लगाए जा रहे हैं कि आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा की ओर से एक बार फिर चीमा परिवार ही मैदान में उतर सकता है।
उधर कांग्रेस भी लंबे समय से चले आ रहे चुनावी सूखे को समाप्त करने की रणनीति बनाने में जुटी है। यदि कांग्रेस कोई मजबूत और सर्वमान्य उम्मीदवार उतारने में सफल होती है तो काशीपुर का चुनाव इस बार दिलचस्प मुकाबले में बदल सकता है।
फिलहाल काशीपुर की राजनीति में सबसे बड़ी उत्सुकता भाजपा के टिकट को लेकर बनी हुई है। आने वाले महीनों में पार्टी नेतृत्व का फैसला यह तय करेगा कि काशीपुर की चुनावी लड़ाई पुराने चेहरे के भरोसे लड़ी जाएगी या फिर किसी नए समीकरण के साथ। वहीं जनता की नजरें इस बात पर भी टिकी हैं कि क्या 25 वर्षों का राजनीतिक इतिहास बदलेगा या फिर चीमा परिवार एक बार फिर जीत का नया अध्याय लिखेगा।
(कांग्रेस की चर्चा अगले लेख में)
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