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क्या प्रशासन, पत्रकार और सरकार अपनी मूल जिम्मेदारियों से भटक रहे हैं? लोकतंत्र के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्न? आम जनता पूछ रही तीनों से

@विनोद भगत

लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार, प्रशासन और पत्रकारिता को तीन ऐसे महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है, जिनका अंतिम उद्देश्य जनता के हितों की रक्षा करना है। सरकार नीतियां बनाती है, प्रशासन उन्हें लागू करता है और पत्रकारिता इन दोनों पर निगरानी रखते हुए जनता तक सही जानकारी पहुंचाने तथा सत्ता से जवाबदेही सुनिश्चित करने का कार्य करती है। जब ये तीनों संस्थाएं अपनी-अपनी संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन करती हैं, तब लोकतंत्र मजबूत होता है और जनता का विश्वास भी बना रहता है।

लेकिन वर्तमान समय में समाज के एक बड़े वर्ग के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या ये तीनों संस्थाएं अपने मूल दायित्वों से दूर होती जा रही हैं? क्या कहीं ऐसा तो नहीं कि जनता के प्रति जवाबदेही की जगह एक-दूसरे के साथ बेहतर संबंध बनाए रखने, एक-दूसरे की प्रशंसा करने और अपने-अपने महिमामंडन पर अधिक जोर दिया जाने लगा है? यह प्रश्न केवल किसी एक क्षेत्र या किसी एक सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के व्यापक संदर्भ में गंभीर विचार का विषय है।

सरकार का सबसे बड़ा दायित्व जनता के जीवन को बेहतर बनाना, पारदर्शी शासन देना और जनता की समस्याओं का समाधान करना है। प्रशासन का दायित्व निष्पक्ष, कानूनसम्मत और संवेदनशील तरीके से सरकारी योजनाओं एवं कानूनों को लागू करना है। वहीं पत्रकारिता का धर्म सत्ता से सवाल पूछना, तथ्यों की जांच करना और आम नागरिक की आवाज को प्रमुखता देना है। यदि इन भूमिकाओं में संतुलन बना रहता है तो लोकतंत्र स्वस्थ रहता है।

चिंता तब पैदा होती है जब सरकारी उपलब्धियों के प्रचार को प्राथमिकता मिलने लगती है, प्रशासन जनता की शिकायतों की अपेक्षा औपचारिक आयोजनों में अधिक व्यस्त दिखाई देता है और पत्रकारिता का एक हिस्सा जनसरोकारों की जगह केवल सरकारी कार्यक्रमों या व्यक्तियों के महिमामंडन तक सीमित नजर आता है। ऐसी स्थिति में आम नागरिक के मन में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि उसकी समस्याओं को प्राथमिकता कौन देगा।

यह भी सत्य है कि सभी पत्रकार, सभी अधिकारी या सभी जनप्रतिनिधि एक जैसे नहीं होते। आज भी अनेक अधिकारी पूरी ईमानदारी से काम कर रहे हैं, अनेक पत्रकार कठिन परिस्थितियों में भी जनहित के मुद्दे उठा रहे हैं और अनेक जनप्रतिनिधि जनता की समस्याओं के समाधान के लिए गंभीर प्रयास कर रहे हैं। इसलिए पूरे तंत्र पर एक समान टिप्पणी करना उचित नहीं होगा। फिर भी यदि जनता के बीच इस प्रकार की धारणा बन रही है, तो यह स्वयं में एक महत्वपूर्ण संकेत है, जिस पर गंभीर आत्ममंथन की आवश्यकता है।

लोकतंत्र में स्वस्थ संबंध होना गलत नहीं है। सरकार, प्रशासन और मीडिया के बीच संवाद आवश्यक है। लेकिन यह संवाद तब तक ही लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप माना जाएगा, जब तक उसकी वजह से निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही प्रभावित न हो। यदि पत्रकार कठिन प्रश्न पूछने से बचने लगें, प्रशासन आलोचना को स्वीकार करने के बजाय केवल छवि निर्माण में अधिक रुचि ले और सरकार आलोचनात्मक सुझावों को विरोध मानने लगे, तो लोकतंत्र का संतुलन कमजोर पड़ सकता है।

आज सोशल मीडिया के दौर में सूचना का प्रवाह तेज हुआ है, लेकिन इसके साथ-साथ प्रचार और वास्तविक सूचना के बीच अंतर करना भी कठिन होता जा रहा है। ऐसे समय में जिम्मेदार पत्रकारिता और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। जनता केवल उपलब्धियों की सूची नहीं, बल्कि समस्याओं का समाधान, योजनाओं की वास्तविक स्थिति और शासन-प्रशासन की जवाबदेही भी जानना चाहती है।

आखिरकार लोकतंत्र का वास्तविक केंद्र सरकार, प्रशासन या मीडिया नहीं, बल्कि जनता है। यदि जनता का विश्वास कमजोर पड़ता है तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है। इसलिए सरकार को आलोचना को लोकतंत्र की शक्ति मानना चाहिए, प्रशासन को निष्पक्ष और संवेदनशील रहना चाहिए तथा पत्रकारिता को निर्भीक होकर जनहित के मुद्दों को उठाना चाहिए।

यह समय किसी पर आरोप लगाने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का है। यदि लोकतंत्र के ये तीनों महत्वपूर्ण स्तंभ अपने मूल दायित्वों को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे, तो जनता का विश्वास और लोकतंत्र दोनों मजबूत होंगे। लेकिन यदि व्यक्तिगत छवि, आपसी समीकरण और प्रचार जनसेवा पर भारी पड़ने लगें, तो यह निश्चित रूप से पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। इसलिए आवश्यक है कि सरकार, प्रशासन और पत्रकारिता तीनों स्वयं से यह प्रश्न पूछें कि क्या उनकी प्राथमिकता वास्तव में जनता है, क्योंकि अंततः लोकतंत्र की सफलता का वास्तविक पैमाना जनता का विश्वास और उसका कल्याण ही है।

 

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