@शब्द दूत ब्यूरो (19 अक्टूबर 2026)
देहरादून। उत्तराखंड की कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य से जुड़े मामले में उनके पति गिरधारी लाल साहू उर्फ पप्पू गिरधारी को अदालत से राहत नहीं मिली है। देहरादून की विशेष अदालत ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। इस फैसले के बाद मामले में पुलिस की आगे की कार्रवाई और जांच को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
यह आदेश पांचवीं अपर सत्र न्यायाधीश एवं एससी-एसटी एक्ट की विशेष न्यायाधीश अंजलि बेंजवाल की अदालत ने दिया। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोप अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपराध की ओर संकेत करते हैं। इसी कानूनी आधार पर अग्रिम जमानत देने से इनकार किया गया।
रेखा आर्य ने 15 अक्टूबर 2026 को देहरादून के कैंट थाने में अपने पति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी। शिकायत में कथित तौर पर जान से मारने का आपराधिक षड्यंत्र रचने और जातिसूचक एवं अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल से संबंधित आरोप लगाए गए हैं। प्राथमिकी में वर्ष 2004 की एक कथित घटना का भी उल्लेख है, जिसमें आरोप है कि मंत्री के आवास पर मौजूद स्टाफ के सामने जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया था।
अग्रिम जमानत की मांग करते हुए बचाव पक्ष ने अदालत में घरेलू और आर्थिक विवाद का हवाला दिया। बचाव पक्ष की ओर से कहा गया कि दोनों के बीच लंबे समय से वैवाहिक संबंध हैं और विवाद की पृष्ठभूमि में प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। कथित घटना काफी पुरानी होने के कारण प्राथमिकी दर्ज कराने में हुई देरी पर भी सवाल उठाए गए।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने यह दलील भी दी कि कथित घटना घर के भीतर एक कमरे में हुई थी। इस संबंध में सार्वजनिक रूप से अपमानित किए जाने से जुड़े कानूनी पहलुओं और उच्चतम न्यायालय के पूर्व फैसलों का हवाला दिया गया।
वहीं, अभियोजन पक्ष ने अग्रिम जमानत याचिका का विरोध करते हुए दलील दी कि प्राथमिकी में स्टाफ की मौजूदगी में जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल का स्पष्ट आरोप है। सरकारी पक्ष के अनुसार, कथित घटना के समय अन्य लोगों की मौजूदगी के आरोप को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अभियोजन ने अदालत से कहा कि प्राथमिकी में दर्ज आरोप प्रथम दृष्टया एससी-एसटी एक्ट के दायरे में आते हैं।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही गिरधारी लाल साहू को अग्रिम जमानत के जरिए गिरफ्तारी से मिलने वाली सुरक्षा नहीं मिल सकी। हालांकि, जमानत याचिका खारिज होने का अर्थ आरोपों का अंतिम रूप से साबित होना नहीं है।
अब मामले में पुलिस की जांच और आगे की कानूनी कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी। आरोपों की सत्यता का निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान होगा।
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