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25 लाख टन चीनी योग्य गन्ना एथेनॉल में गया, तीन माह में चीनी 40% महंगी; सरकार ने 10 लाख टन आयात को दी मंजूरी

@शब्द दूत ब्यूरो (22 अगस्त 2026)

नयी दिल्ली। देश में चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच गन्ने के एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल को लेकर बहस तेज हो गई है। करीब 25 लाख टन चीनी योग्य गन्ना एथेनॉल उत्पादन में चला गया है। इसका असर चीनी की उपलब्धता और कीमतों पर दिखाई दे रहा है। बीते तीन महीनों में चीनी के दाम करीब 40 प्रतिशत बढ़कर 67 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गए हैं। इसी अवधि में गुड़ के दाम 24 प्रतिशत, चावल के दाम 16 प्रतिशत और मक्के के आटे के दाम करीब 11 प्रतिशत तक बढ़े हैं।

चीनी की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने टैरिफ रेट कोटा व्यवस्था के तहत 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन कच्ची या सफेद चीनी के आयात की अनुमति दी है। साथ ही, थोक में 10 टन से अधिक चीनी खरीदने वाले उपभोक्ताओं पर स्टॉक लिमिट भी लागू की गई है। इसका उद्देश्य जमाखोरी पर अंकुश लगाना और घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखना है।

अक्टूबर  से शुरू होने वाले 2026-27 चीनी सीजन में घरेलू खपत के लिए चीनी का ओपनिंग स्टॉक करीब 50 लाख टन से कम रहने का अनुमान है। एथेनॉल उत्पादन में गन्ने की बढ़ती हिस्सेदारी को भी इसकी एक प्रमुख वजह माना जा रहा है। ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष करीब 720 करोड़ लीटर एथेनॉल का उत्पादन हुआ था। इसके लिए लगभग 1.33 करोड़ टन अनाज और 25 लाख टन चीनी योग्य गन्ने का इस्तेमाल हुआ।

चीनी उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 में पेराई से पहले मिलों के पास करीब 47 लाख टन चीनी का ओपनिंग स्टॉक था, जबकि 2026-27 के पेराई सीजन से पहले यह घटकर करीब 32 लाख टन रह गया। इस कमी की वजह 2025-26 में बड़ी मात्रा में गन्ने को एथेनॉल उत्पादन की ओर भेजा जाना भी बताया गया है। अनुमान है कि 2026-27 में देश में कुल चीनी उत्पादन करीब 46.3 करोड़ टन नहीं बल्कि लगभग 3.36 करोड़ टन के आसपास रह सकता है, जो पिछले वर्ष के अनुमान से करीब 12 प्रतिशत अधिक है। वहीं, इस बार शुरुआती स्टॉक घटने के कारण घरेलू बाजार में उपलब्धता पर दबाव बना हुआ है।

पूरी स्थिति का असर सिर्फ चीनी तक सीमित नहीं है। गन्ने से बनने वाले उत्पादों के अलावा पशु आहार और पोल्ट्री फीड की कीमतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि चीनी की कीमत तीन माह पहले 48 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 67 रुपये हो गई, जबकि गुड़ 50 रुपये से बढ़कर 65 रुपये प्रति किलो पहुंच गया। चावल कन्नकी 25 से 29 रुपये, मक्के का आटा 36 से 40 रुपये और पशु आहार 29 से 32 रुपये प्रति किलो हो गया।

सरकार की ओर से चीनी आयात की कोशिशों के बावजूद बाजार में तत्काल राहत मिलना आसान नहीं माना जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक नवंबर से पहले दुनिया भर से इतनी मात्रा में चीनी मिलने की संभावना कम है। इसके अलावा भारत खुद भी चीनी का बड़ा निर्यातक देश रहा है, इसलिए घरेलू मांग पूरी करने के लिए आयात बढ़ाना चीनी बाजार के संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी का असर आम उपभोक्ताओं के साथ-साथ खाद्य उद्योग पर भी पड़ सकता है। मिठाई, बिस्कुट, पेय पदार्थ और अन्य खाद्य उत्पादों की लागत बढ़ने से आने वाले समय में इनके दामों पर भी दबाव पड़ने की संभावना है। ऐसे में सरकार के सामने एक ओर एथेनॉल उत्पादन और ऊर्जा नीति के लक्ष्यों को बनाए रखने तथा दूसरी ओर घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता और कीमतों को नियंत्रित रखने के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है।

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