@शब्द दूत ब्यूरो (01 जुलाई 2026)
काशीपुर। आधी रात के बाद कार की चपेट में आकर एक गर्भवती गाय की मौत केवल एक सड़क दुर्घटना नहीं है। यह उस लापरवाही, प्रशासनिक उदासीनता और सामाजिक गैर-जिम्मेदारी का दर्दनाक परिणाम है, जिसकी कीमत आए दिन इंसानों और बेजुबान पशुओं दोनों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है।
शहर की लगभग हर सड़क, हर चौराहे और हर मोहल्ले में आवारा घूमते या सड़कों पर बैठे मवेशी आम दृश्य बन चुके हैं। स्थानीय लोग इस समस्या से रोज दो-चार होते हैं, लेकिन जिम्मेदार विभागों की आंखें मानो बंद हैं। सवाल यह है कि जब आम नागरिकों को यह खतरा साफ दिखाई देता है, तो प्रशासन को क्यों नहीं?
विडंबना यह है कि जैसे ही किसी वीआईपी का शहर में आगमन होता है, पूरा प्रशासन और पुलिस तंत्र सक्रिय हो उठता है। सड़कों से पशु हटाए जाते हैं, यातायात व्यवस्थित किया जाता है और सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद दिखाई देती है। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या प्रशासन केवल वीआईपी की सुरक्षा के लिए है? क्या आम नागरिकों और बेजुबान पशुओं की जान की कोई कीमत नहीं?
यदि इस दर्दनाक हादसे के जिम्मेदारों की सूची बनाई जाए तो सबसे पहला नाम स्थानीय प्रशासन का होना चाहिए। आखिर क्यों शहर की सड़कों पर खुलेआम घूम रहे निराश्रित पशुओं को हटाने के लिए प्रभावी अभियान नहीं चलाया जाता? क्यों पशु मालिकों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती, जो दूध निकालने के बाद गायों को सड़कों पर छोड़ देते हैं? यदि नियमों का सख्ती से पालन कराया जाए तो ऐसी घटनाओं में निश्चित रूप से कमी आ सकती है।
दूसरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी उन पशुपालकों की है, जो अपने आर्थिक लाभ के लिए गाय पालते हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा और देखभाल की जिम्मेदारी निभाने से बचते हैं। दूध देने तक गाय उनकी होती है, लेकिन उसके बाद वही गाय सड़क पर अपनी किस्मत के भरोसे छोड़ दी जाती है। यह न केवल अमानवीय है बल्कि समाज के लिए भी गंभीर खतरा बन चुका है।
तीसरा दोष उन वाहन चालकों का भी है जो तेज रफ्तार और लापरवाही से वाहन चलाते हैं। यदि सड़क पर कोई पशु बैठा दिखाई दे रहा है तो चालक का नैतिक और कानूनी दायित्व है कि वह गति कम करे और सावधानी बरते। यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि अन्य लोग लापरवाह थे, इसलिए चालक की जिम्मेदारी कम हो जाती है।
काशीपुर में यह पहली घटना नहीं है और यदि हालात नहीं बदले तो संभवतः आखिरी भी नहीं होगी। आज एक गर्भवती गाय की जान गई है, कल कोई मासूम बच्चा, बुजुर्ग या बाइक सवार भी इसी लापरवाही का शिकार हो सकता है।
अब समय केवल शोक व्यक्त करने का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है। स्थानीय प्रशासन को निराश्रित पशुओं के लिए प्रभावी व्यवस्था बनानी होगी, पशु मालिकों पर कठोर कार्रवाई करनी होगी और यातायात नियमों का सख्ती से पालन कराना होगा। अन्यथा हर अगली दुर्घटना के बाद जिम्मेदारों के बयान तो बदलेंगे, लेकिन सड़क पर बहता खून और बेजुबानों की मौत का सिलसिला नहीं रुकेगा।
प्रश्न यही है—काशीपुर में आखिर कब जागेगा प्रशासन? और कब तय होगी उन लोगों की जिम्मेदारी, जिनकी लापरवाही हर दिन किसी न किसी की जान पर भारी पड़ रही है?
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