@विनोद भगत
आजकल यह ताना इतनी आसानी से दिया जाता है, मानो पत्रकारिता कोई पेशा नहीं, बल्कि बाजार में मिलने वाली ऐसी वस्तु हो, जिसे कोई भी खरीदकर अपनी जेब में रख ले। किसी के हाथ में माइक दिखाई दिया, गले में आईडी कार्ड लटका दिखा और मोबाइल कैमरा चालू हुआ नहीं कि टिप्पणी तैयार—लो जी, एक और पत्रकार पैदा हो गया! लेकिन जनाब, सवाल यह है कि पत्रकारों की बढ़ती संख्या पर इतनी चिंता करने वालों ने कभी नेताओं की बढ़ती फौज का हिसाब लगाया है? या फिर समाज की सारी समस्याओं का ठीकरा पत्रकारों के सिर पर फोड़ देना ही सबसे आसान काम बन गया है?
आजकल चाय की दुकान हो, नुक्कड़ हो, बाजार हो या किसी समारोह में चार लोग इकट्ठा बैठे हों, पत्रकारों पर टिप्पणी करने वाले मिल ही जाएंगे। बड़े आत्मविश्वास से कहा जाता है कि अब तो गली-गली पत्रकार पैदा हो गए हैं। कोई भी एक आईडी बनवाता है, माइक खरीदता है और पत्रकार बनकर घूमने लगता है। ऐसा कहने वालों के चेहरे पर एक अलग ही संतोष दिखाई देता है, मानो उन्होंने देश की सबसे बड़ी समस्या खोज निकाली हो। मगर जरा ठहरिए हुजूर! इतनी ही चिंता अगर समाज की दूसरी व्यवस्थाओं को लेकर भी दिखाई जाती, तो शायद कई और दिलचस्प आंकड़े सामने आ जाते।
कभी अपने आसपास नजर दौड़ाइए। पड़ोस के घर में कोई पत्रकार हो या न हो, नेता जरूर मिल जाएगा। परिवार में कोई राजनीति में सक्रिय हो या न हो, सलाह देने वाला नेता मौजूद होगा। गली में नाली जाम हो जाए, सड़क टूट जाए, बिजली चली जाए या पानी की सप्लाई बंद हो जाए, तुरंत कोई न कोई स्वयंभू जनप्रतिनिधि सामने आ जाता है। उसके पास न कोई चुनावी घोषणा पत्र होता है, न कोई जिम्मेदारी का आधिकारिक कागज, लेकिन बातचीत में उसका रुतबा ऐसा होता है जैसे पूरे मोहल्ले का भविष्य उसी की जेब में रखा हो।
यहां एक दिलचस्प अंतर समझने की जरूरत है। पत्रकार के हाथ में माइक देखकर लोगों को लोकतंत्र खतरे में नजर आने लगता है, लेकिन हर गली में नेता बनने की होड़ देखकर शायद लोकतंत्र की सेहत अचानक दुरुस्त दिखाई देने लगती है। पत्रकार सवाल पूछे तो उसकी औकात पर चर्चा होने लगती है, लेकिन नेता सवालों का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वाले की नीयत पर चर्चा शुरू कर दे, तो उसे राजनीतिक कौशल का नाम दे दिया जाता है। वाह रे समाज! कसौटियां भी ऐसी कि एक के लिए नियम अलग और दूसरे के लिए सुविधानुसार अलग।
अब इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि हर व्यक्ति, जिसके पास माइक और आईडी कार्ड है, वह पत्रकारिता के सभी मानकों पर खरा उतरता है। पत्रकारिता केवल कैमरा उठाने, खबर चलाने या सोशल मीडिया पर वीडियो डालने का नाम नहीं है। इसमें तथ्य जुटाना, खबर की पुष्टि करना, दोनों पक्षों को सुनना, भाषा की मर्यादा बनाए रखना और गलत सूचना से बचना भी शामिल है। बिना जांचे किसी पर आरोप लगा देना, किसी की निजी जिंदगी को तमाशा बना देना या खबर के नाम पर दबाव बनाने की कोशिश करना पत्रकारिता नहीं है। ऐसे मामलों पर सवाल उठना भी चाहिए और आत्ममंथन भी होना चाहिए।
लेकिन यही कसौटी राजनीति पर भी लागू होनी चाहिए। केवल चुनाव लड़ने, किसी पार्टी का झंडा उठाने, नेताओं के साथ तस्वीर खिंचवाने या सोशल मीडिया पर खुद को जनसेवक लिख लेने से कोई व्यक्ति जनसेवा का आदर्श नहीं बन जाता। जनता के बीच जाना, समस्याएं सुनना, वादों का हिसाब देना, सार्वजनिक संसाधनों के प्रति जवाबदेह रहना और अपने काम का मूल्यांकन स्वीकार करना भी जरूरी है। आखिर लोकतंत्र में पहचान का दावा करने से ज्यादा महत्वपूर्ण है उस पहचान के अनुरूप जिम्मेदारी निभाना।
मगर विडंबना देखिए, पत्रकारों की संख्या पर टिप्पणी करने वाले कई लोग कभी यह नहीं पूछते कि नेताओं की संख्या बढ़ने के साथ जनता की समस्याओं का समाधान कितना बढ़ा? कितने लोग केवल पद और पहचान के पीछे भाग रहे हैं? कितने लोग चुनाव के समय जनता के बीच दिखाई देते हैं और उसके बाद जनता को ही ढूंढना पड़ता है कि हमारा प्रतिनिधि आखिर है कहां? इन सवालों का जवाब किसी एक व्यक्ति या पूरे राजनीतिक वर्ग पर आरोप लगाकर नहीं दिया जा सकता, लेकिन सवाल पूछना तो बनता है।
आखिर नेता बनने की होड़ पर वैसी ही सार्वजनिक चर्चा क्यों नहीं होती, जैसी पत्रकार बनने पर होती है? पत्रकार की आईडी देखकर उसकी योग्यता पर सवाल उठाए जाते हैं, तो राजनीति में उतरने वाले व्यक्ति की योग्यता, अनुभव, सार्वजनिक काम और जवाबदेही पर भी चर्चा होनी चाहिए। पत्रकार से पूछा जाता है कि उसने पत्रकारिता की पढ़ाई की है या नहीं, तो नेता से भी पूछा जाना चाहिए कि उसने जनता के लिए किया क्या है। यहां बात किसी अनिवार्य डिग्री की नहीं, बल्कि काम, समझ, ईमानदारी और जिम्मेदारी की है।
और जनाब, एक बात और! पत्रकारिता की आलोचना करना गलत नहीं है। स्वस्थ लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका पर सवाल उठने चाहिए। मीडिया संस्थानों की जवाबदेही, खबरों की विश्वसनीयता और पत्रकारों के आचरण पर बहस होनी चाहिए। लेकिन आलोचना और ताने में फर्क होता है। आलोचना किसी कमी को सामने लाकर सुधार का रास्ता दिखाती है, जबकि ताना अक्सर बिना किसी प्रमाण के पूरे पेशे को कटघरे में खड़ा कर देता है। जब कोई कहता है कि गली-गली पत्रकार पैदा हो गए हैं, तो उससे पूछने का मन करता है—जनाब, समस्या पत्रकारों की संख्या है या पत्रकारिता के मानकों की? क्योंकि संख्या बढ़ना अपने आप में किसी पेशे की विफलता का प्रमाण नहीं है।
इसी तरह राजनीति में लोगों की भागीदारी बढ़ना भी अपने आप में बुरी बात नहीं है। लोकतंत्र में अधिक लोगों का सार्वजनिक जीवन में आना सकारात्मक हो सकता है। असली सवाल यह है कि वे किस उद्देश्य से आते हैं, जनता के प्रति कितने जवाबदेह रहते हैं और अपने अधिकारों के साथ अपनी जिम्मेदारियों को कितना समझते हैं। इसलिए समस्या को केवल संख्या के चश्मे से देखना भी उचित नहीं। सवाल उस प्रवृत्ति का है, जिसमें सेवा से पहले पद, जिम्मेदारी से पहले पहचान और काम से पहले प्रचार महत्वपूर्ण हो जाता है।
कभी-कभी लगता है कि समाज ने भी अपने लिए बड़ी सुविधाजनक व्यवस्था बना ली है। किसी पत्रकार से नाराजगी हुई तो पूरी पत्रकार बिरादरी पर टिप्पणी कर दी। किसी नेता से निराशा हुई तो दूसरे दिन फिर उसी के समर्थन में नारे लगा दिए। किसी खबर ने असुविधाजनक सवाल पूछ लिया तो पत्रकार बिकाऊ हो गया, लेकिन किसी नेता ने वर्षों तक जवाब नहीं दिया तो उसे राजनीतिक मजबूरी कहकर बात खत्म कर दी गई। यह दोहरा रवैया आखिर कब तक चलेगा?
पत्रकारिता और राजनीति दोनों ही सार्वजनिक जीवन से जुड़े क्षेत्र हैं। दोनों में अच्छे लोग भी हैं, कमियां भी हैं और सुधार की गुंजाइश भी। किसी पेशे के कुछ लोगों के आचरण के आधार पर सभी को एक ही तराजू में तौलना न उचित है, न समझदारी। लेकिन जिस समाज में सवाल पूछने वाले से पहले उसकी पहचान पूछी जाती है और जवाब देने वाले से सवाल पूछना भूल जाते हैं, वहां समस्या केवल पत्रकारों या नेताओं की नहीं, हमारी सोच की भी है।
इसलिए अगली बार जब कोई कहे कि गली-गली पत्रकार पैदा हो गए हैं, तो मुस्कराकर उससे इतना जरूर पूछिएगा—जनाब, गली-गली नेता पैदा होने पर आपका शोध कब प्रकाशित हो रहा है? आखिर उनके आंकड़े भी तो जुटाइए। कितने नेता, कितने पद, कितने वादे और कितने पूरे हुए काम! कहीं ऐसा तो नहीं कि पत्रकारों की संख्या गिनते-गिनते हम उन सवालों को भूल रहे हैं, जिनके जवाब जनता को वास्तव में चाहिए?
और रही बात आईडी और माइक की, तो उनसे कोई अपने आप अच्छा पत्रकार नहीं बन जाता। ठीक उसी तरह कुर्सी, पद, झंडा और राजनीतिक पहचान किसी को अपने आप अच्छा नेता नहीं बना देते। दोनों की असली पहचान उनके काम, आचरण और जवाबदेही से होनी चाहिए।
अब फैसला जनता को करना है कि उसे केवल पहचान के नाम पर तालियां बजानी हैं या काम के आधार पर सवाल पूछने हैं। पत्रकार हो या नेता, जो जनता के सवालों का सामना करने से बचता है, उससे सवाल जरूर कीजिए। क्योंकि लोकतंत्र में न माइक कोई अपराध है, न राजनीति कोई विशेषाधिकार। असली कसौटी यह है कि माइक से सच कितना बोला जा रहा है और कुर्सी पर बैठकर जनता के लिए कितना काम किया जा रहा है।
तो जनाब, सोच बदलने की जरूरत है। पत्रकारों की गिनती करने से पहले पत्रकारिता के स्तर पर बात कीजिए और नेताओं की गिनती करने के साथ उनके काम का हिसाब भी मांगिए। वरना ऐसा न हो कि हम पूरी जिंदगी माइक वाले को कटघरे में खड़ा करते रहें और कुर्सी वाले से सवाल पूछना ही भूल जाएं।
आखिर लोकतंत्र में सबसे बड़ी चिंता यह नहीं होनी चाहिए कि गली-गली पत्रकार पैदा हो गए हैं या नेता। सबसे बड़ा सवाल यह होना चाहिए कि गली-गली पैदा हो रही पहचान के बीच जनता के प्रति वास्तविक जिम्मेदारी निभाने वाले कितने हैं?
लेकिन अंत में ये जरूर सोचिये कि आम जनता की बात तो अलग है पढ़े लिखे उच्च से उच्च शिक्षा प्राप्त अधिकारी भी इन पत्रकारों और नेताओं की ही जी हजूरी करते दिखाई दे रहे हैं। जो अपने पिता के सामने बैठने में भी शर्म करें उन्हें भी इन योग्य अधिकारियों को माननीय और सम्मानित कहकर संबोधित करना पड़ता है। ऐसे में क्या उनका जमीर और स्वाभिमान जीवित रह पाता होगा?
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