@शब्द दूत ब्यूरो (25 मार्च 2026)
नयी दिल्ली। देश में एलपीजी (रसोई गैस) और अन्य पेट्रोलियम पदार्थों की उपलब्धता को लेकर लोगों के बीच चिंता बढ़ती दिखाई दे रही है। हाल ही में एलपीजी सिलेंडर बुकिंग से जुड़े नियमों में बदलाव के बाद यह आशंका और गहरा गई है कि कहीं आने वाले दिनों में गैस की किल्लत न हो जाए।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार नई व्यवस्था के तहत अब डबल सिलेंडर उपभोक्ताओं के लिए रीफिल बुकिंग का अंतराल 25 दिनों से बढ़ाकर 35 दिन कर दिया गया है। वहीं, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के लिए यह अवधि 45 दिन कर दी गई है। इस बदलाव का सीधा असर आम उपभोक्ताओं की रसोई पर पड़ सकता है, खासकर उन परिवारों पर जो नियमित रूप से गैस पर निर्भर हैं।
उधर सरकार ने उन खबरों और सोशल मीडिया पोस्टों का खंडन किया है जिनमें दावा किया गया था कि प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना -पीएमयूवाई के तहत एलपीजी कनेक्शनों के लिए रिफिल बुकिंग की समय सीमा को संशोधित करके 45 दिन कर दिया गया है।
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और संभावित युद्ध की स्थिति ने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में अस्थिरता पैदा कर दी है। चूंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, ऐसे में वहां की परिस्थितियों का सीधा असर देश पर पड़ना स्वाभाविक है।
यदि मिडिल ईस्ट में हालात और बिगड़ते हैं, तो कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और आपूर्ति में बाधा आ सकती है। इसका असर पेट्रोल, डीजल के साथ-साथ एलपीजी की उपलब्धता और कीमतों पर भी पड़ सकता है। हालांकि, सरकार और तेल कंपनियां आमतौर पर ऐसे संकटों से निपटने के लिए वैकल्पिक आपूर्ति और भंडारण की व्यवस्था रखती हैं, जिससे तत्काल बड़ी किल्लत की संभावना कम हो जाती है।
फिलहाल, बुकिंग अंतराल बढ़ाने के पीछे आधिकारिक तौर पर आपूर्ति प्रबंधन और समान वितरण को कारण बताया जा रहा है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी उपभोक्ताओं को समय पर गैस उपलब्ध हो सके और किसी भी प्रकार की कृत्रिम कमी की स्थिति न बने।
आम उपभोक्ताओं के लिए जरूरी है कि वे घबराहट में आकर अतिरिक्त बुकिंग या स्टॉक करने से बचें। साथ ही गैस का उपयोग सोच-समझकर करें, ताकि जरूरत के समय किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।
मौजूदा हालात को देखते हुए सतर्क रहने की आवश्यकता है, लेकिन अभी घबराने की नहीं। आने वाले समय में मिडिल ईस्ट की स्थिति और सरकार के कदम यह तय करेंगे कि देश में पेट्रोलियम पदार्थों की उपलब्धता पर कितना असर पड़ेगा।
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