@शब्द दूत ब्यूरो (22 मार्च 2026)
काशीपुर। चैती मेले में लगने वाला प्रसिद्ध नखासा (घोड़ा) बाजार इस वर्ष भी घोड़ा प्रेमियों के लिए खास आकर्षण बना हुआ है। उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों से भी व्यापारी अपने बेहतरीन नस्ल के घोड़े लेकर यहां पहुंचे हैं। मेले में घोड़ों की खरीद-फरोख्त के साथ-साथ उनकी चाल, नस्ल और विशेषताओं को लेकर भी लोगों में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है।
घोड़ा व्यापारियों के अनुसार, वे पिछले कई वर्षों से इस मेले में आ रहे हैं। गुजरात से आए एक व्यापारी ने बताया कि वे पिछले अनेक वर्ष से 100 साल से भी अधिक समय से प्रचलित इस परंपरा से जुड़े हैं। वहीं राजस्थान के बालोतरा क्षेत्र से आए व्यापारी पिछले 20 वर्षों से लगातार यहां घोड़े बेचने आ रहे हैं।
मेले में घोड़ों की कीमत तय नहीं होती, बल्कि उनकी नस्ल, चाल और काबिलियत के आधार पर दाम तय किए जाते हैं। यहां घोड़े 50 हजार रुपये से लेकर 1.5 लाख रुपये या उससे अधिक कीमत तक बिक रहे हैं, जबकि कुछ खास नस्ल और चाल वाले घोड़े लाखों में भी पहुंच जाते हैं। व्यापारियों का कहना है कि “अच्छे घोड़े की कोई निश्चित कीमत नहीं होती, वह अनमोल होता है।”
घोड़ों की ‘रेवाल चाल’ (विशेष चाल) को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है। यह चाल जितनी बेहतर होती है, घोड़े की कीमत उतनी ही अधिक होती है। हर घोड़े की चाल अलग-अलग होती है, जो उसकी पहचान और मूल्य को तय करती है।
मेले में सिंधी और मारवाड़ी नस्ल के घोड़े प्रमुख रूप से देखने को मिल रहे हैं। व्यापारियों के अनुसार, सिंधी घोड़े अपनी खास चाल के लिए जाने जाते हैं, जबकि मारवाड़ी घोड़े मजबूती और तांगा चलाने के लिए बेहतर माने जाते हैं। इसके अलावा ‘नुखरा’ नस्ल के घोड़े भी शौकिया तौर पर पाले जाते हैं।
घोड़ों की उम्र भी उनकी कीमत में अहम भूमिका निभाती है। आमतौर पर 2 साल की उम्र में घोड़े बिक्री के लिए तैयार हो जाते हैं, जबकि मेले में 3 से 5 साल तक के घोड़े अधिक संख्या में देखने को मिल रहे हैं।
मेले में कुछ लोग घोड़ों को शौक के लिए खरीदते हैं, तो कुछ पारंपरिक उपयोग जैसे तांगा चलाने के लिए। कई खरीदार घोड़ों की विशेष कलाबाजियां और चाल देखकर ही खरीदारी का निर्णय लेते हैं। एक व्यापारी ने बताया कि उनके पास 12 घोड़े थे, जिनमें से अब तक 3 बिक चुके हैं, जबकि बाकी की बिक्री की उम्मीद बनी हुई है।
घोड़ा बाजार में एक मारवाड़ी घोड़ा अपनी कलाबाजी और ‘माथा टेकने’ की कला के कारण लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। इसकी कीमत लगभग 1 लाख रुपये बताई जा रही है, हालांकि मालिक फिलहाल इसे बेचने के मूड में नहीं है और केवल मेले में प्रदर्शन के लिए लाया है।
कुल मिलाकर, काशीपुर का नखासा घोड़ा बाजार न केवल व्यापार का केंद्र है, बल्कि घोड़ा प्रेमियों के लिए परंपरा, शौक और संस्कृति का जीवंत संगम भी बना हुआ है।
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