@विनोद भगत
देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक और पौराणिक विरासत अतुलनीय है। हरेला पर्व उत्तराखंड की उस गौरवशाली इतिहास का ही अंग है। पूरा विश्व जब पर्यावरण असंतुलन को लेकर चिंतित है ऐसे में उत्तराखंड का यह लोक पर्व दर्शाता है कि देवभूमि में सदियों पूर्व ही पर्यावरण को लेकर जागरूकता रही है।

एक समय था जब उत्तराखंड के लोग इस लोक पर्व हरेले पर कानों में हरेले को लगाये निकलते थे। तो लोग दूर से ही समझ जाते थे कि यह व्यक्ति उत्तराखंड का निवासी है।
ये गर्व की बात थी उत्तराखंड के निवासी को उसकी सांस्कृतिक विरासत से पहचाना जाता था। साथ ही एक संदेश पर्यावरण जागरूकता का भी लोगों तक पहुंचाया जाता था। उत्तराखंड का यह लोक-पर्व ‘हरेला’ हमारी हरित संस्कृति की अभिव्यक्ति है।
यह हर्ष की बात है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने उत्तराखंड के इस लोक पर्व को सरकारी स्तर पर मनाने की शुरुआत कर दी।
सावन लगने से नौ दिन पहले पांच या सात प्रकार के अनाज के बीज एक रिंगाल को छोटी टोकरी में मिटटी डाल के बोई जाती है। इसे सूर्य की सीधी रोशनी से बचाया जाता है और प्रतिदिन सुबह पानी से सींचा जाता है। नौवें दिन इनकी पाती की टहनी से गुड़ाई की जाती है और दसवें यानि कि हरेला के दिन इसे काटा जाता है। और विधि अनुसार घर के बुजुर्ग सुबह पूजा-पाठ करके हरेले को देवताओं को चढ़ाते हैं। उसके बाद घर के सभी सदस्यों को हरेला लगाया जाता हैं।
हरेला चढ़ाते समय बड़े- बुजुर्गो द्वारा आशीर्वाद दिया जाता है-
जी रया ,जागि रया,
यो दिन बार, भेटने रया,
दुबक जस जड़ हैजो,
पात जस पौल हैजो,
स्यालक जस त्राण हैजो,
हिमालय में ह्यू छन तक,
गंगा में पाणी छन तक,
हरेला त्यार मानते रया
जी रया जागी रया.
हरेला घर में सुख-समृद्धि और शान्ति के लिए बोया जाता है। हरेला अच्छी फसल का सूचक भी है, हरेला इस कामना के साथ बोया जाता है कि इस वर्ष कृषि-फसलों को कोई क्षति ना हो। यह भी मान्यता है कि जिसका हरेला जितना बडा होगा उसे कृषि मे उतना ही लाभ मिलेगा।
वैसे तो हरेला घर-घर में बोया जाता है, लेकिन किसी-किसी गांव में हरेला पर्व को सामूहिक रुप से स्थानीय ग्राम देवता मंदिर में मनाया जाता हैं। गाँव के लोगो द्वारा मिलकर मंदिर में हरेला बोई जाती हैं और सभी लोगों द्वारा उत्साह और उमंग के साथ मिलकर बडे हर्षोल्लास से मनाया जाता हैं। इससे गाँव में एक नई ऊर्जा का संचार होता है।
आइये, इस हरेला पर्व पर इस प्रार्थना के साथ वृक्षारोपण करें कि कोराना काल में हम सब स्वस्थ एवं सुरक्षित रहें और इसके लिये अपने पर्यावरण को भी सुरक्षित रखें ताकि हम अपनी सन्तति को एक सुन्दर, सुखद और हरियालीयुक्त भविष्य प्रदान कर सकें।

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