@शब्द दूत ब्यूरो (02 फरवरी 2026)
लकड़ी को काटने वाली कुल्हाड़ी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसका फाल नहीं, बल्कि वह बेंट होता है जो उसे थामे रहता है। विडंबना देखिए कि कुल्हाड़ी का वही बेंट भी लकड़ी का ही बना होता है। यानी जिस लकड़ी को काटा जाना है, उसी परिवार का एक हिस्सा कुल्हाड़ी को ताकत देता है। यह दृश्य केवल एक औज़ार की बनावट नहीं, बल्कि समाज, राजनीति, संस्कृति और मनुष्य की मानसिकता का गहरा प्रतीक है। आज जो कुछ भी हमारे चारों ओर घट रहा है, उसे समझने के लिए यह उपमा पूरी तरह सटीक बैठती है—अपना ही अपने को काट रहा है।
कुल्हाड़ी का फाल तब तक कुछ नहीं कर सकता, जब तक बेंट उसे दिशा और बल न दे। उसी तरह किसी भी अन्याय, शोषण या विनाश के पीछे केवल बाहरी ताक़तें नहीं होतीं, बल्कि भीतर से मिला सहयोग सबसे बड़ा हथियार बन जाता है। जब समाज के ही लोग, अपने स्वार्थ, भय या भ्रम में पड़कर, अपने ही समाज के खिलाफ खड़े हो जाते हैं, तब विनाश तेज़ और स्थायी होता है।
आज हर स्तर पर स्वार्थ ने बेंट का रूप ले लिया है। व्यक्तिगत लाभ के लिए सामूहिक हित की बलि दी जा रही है। नौकरी, पद, पहचान या थोड़े से लाभ के बदले लोग उन नीतियों और निर्णयों का समर्थन करने लगते हैं, जो अंततः उन्हीं के भविष्य को खोखला कर देते हैं। बाहर से वार करने वाली कुल्हाड़ी तो दिखाई देती है, लेकिन भीतर से पकड़ा गया बेंट अक्सर अदृश्य रह जाता है।
भाषा, परंपरा, लोकसंस्कृति और सामाजिक एकता—ये सब किसी समाज की जड़ें होती हैं। जब इन्हीं जड़ों से जुड़े लोग, आधुनिकता या सुविधाओं के नाम पर, अपनी पहचान को हीन समझने लगते हैं, तब वे स्वयं ही उस कुल्हाड़ी का बेंट बन जाते हैं जो उनकी संस्कृति को काट देती है। बाहर से हमला करने वालों से ज़्यादा खतरनाक वे होते हैं, जो भीतर रहते हुए उसी हमले को वैधता देते हैं।
राजनीति में यह दृश्य और भी स्पष्ट दिखाई देता है। आम जनता के नाम पर चुने गए प्रतिनिधि, जब सत्ता या लाभ के लिए जनता के हितों के विरुद्ध निर्णय लेते हैं, तब वे उसी लकड़ी के बने बेंट की तरह हो जाते हैं। व्यवस्था की कुल्हाड़ी उन्हीं के कंधों पर रखकर समाज की बुनियाद पर वार किया जाता है।
सबसे बड़ा संकट मानसिक गुलामी है। जब व्यक्ति यह मान ले कि बदलाव या शक्ति बाहर से ही आएगी, और स्वयं की भूमिका नगण्य है, तब वह आसानी से बेंट बन जाता है। सोचने, सवाल करने और विरोध करने की क्षमता समाप्त होते ही मनुष्य औज़ार बन जाता है—ऐसा औज़ार जो अपने ही अस्तित्व को नुकसान पहुँचाता है।
इस स्थिति से बाहर निकलने का रास्ता भी इसी प्रतीक में छिपा है। अगर बेंट अपनी भूमिका पहचान ले और कुल्हाड़ी को दिशा देने से इंकार कर दे, तो फाल निष्प्रभावी हो जाएगा। समाज में जागरूकता, आत्मसम्मान, सामूहिक सोच और नैतिक साहस ही वह शक्ति है, जो इस आत्मघाती प्रक्रिया को रोक सकती है।
कुल्हाड़ी का बेंट हमें चेतावनी देता है कि सबसे बड़ा खतरा बाहर नहीं, भीतर होता है। जब तक हम यह नहीं समझेंगे कि हमारी चुप्पी, हमारा स्वार्थ और हमारी उदासीनता किसे ताकत दे रही है, तब तक “अपना ही अपने को काटता है” वाली स्थिति बनी रहेगी। समय आ गया है कि हम लकड़ी नहीं, चेतन मनुष्य बनें—और किसी भी कुल्हाड़ी को अपने ही अस्तित्व के खिलाफ इस्तेमाल होने से रोकें।
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