@विनोद भगत
उत्तराखंड में वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियाँ तेज़ होती जा रही हैं। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर सत्ता में वापसी का दावा कर रही है, जबकि कांग्रेस लगातार आक्रामक तेवर अपनाते हुए सरकार को विभिन्न मुद्दों पर घेर रही है। इस सियासी संघर्ष के केंद्र में जहाँ विकास, स्थिरता और निर्णायक नेतृत्व जैसे दावे हैं, वहीं दूसरी ओर कानून-व्यवस्था, न्याय, संवेदनशील मामलों और सामाजिक कार्रवाइयों को लेकर उठते सवाल भी हैं। ऐसे में यह चुनाव केवल सत्ता का नहीं, बल्कि भरोसे और जवाबदेही का भी इम्तिहान बनने जा रहा है।
भाजपा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में अपने कार्यकाल की उपलब्धियों को प्रमुखता से सामने रख रही है। समान नागरिक संहिता (UCC) का लागू होना, चारधाम ऑल वेदर रोड परियोजना, केदारनाथ-बदरीनाथ पुनर्निर्माण, सड़क और हवाई कनेक्टिविटी में सुधार, तथा सीमांत क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का विकास पार्टी के प्रमुख चुनावी हथियार होंगे। केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार होने का लाभ, मजबूत संगठनात्मक ढांचा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता भी भाजपा के लिए बड़ा राजनीतिक संबल है।
इसके साथ ही धामी सरकार की सख्त प्रशासनिक छवि को रेखांकित करने के लिए राज्य में अवैध अतिक्रमण के खिलाफ चलाए गए अभियानों का भी उल्लेख किया जा रहा है। सैकड़ों मजारों और अन्य कथित अवैध संरचनाओं पर बुलडोजर की कार्रवाई को सरकार “कानून के समान अनुपालन” और “राज्य की भूमि की रक्षा” के रूप में प्रस्तुत कर रही है। भाजपा समर्थक इसे मजबूत शासन और निर्णय लेने की क्षमता का प्रतीक मानते हैं, जबकि विपक्ष इसे एकतरफा और राजनीतिक रूप से प्रेरित कार्रवाई बताकर सवाल उठा रहा है।
वहीं, धामी सरकार के कार्यकाल का सबसे संवेदनशील और विवादास्पद मुद्दा अंकिता भंडारी हत्याकांड रहा है। इस मामले ने राज्य की राजनीति को गहरे तक झकझोर दिया। कांग्रेस लगातार आरोप लगाती रही है कि इस प्रकरण में प्रभावशाली लोगों को बचाने का प्रयास हुआ और न्याय प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर संदेह बना रहा। हालांकि सरकार का कहना है कि मामले में सख्त कार्रवाई हुई, आरोपियों पर कानून के तहत कदम उठाए गए और न्यायिक प्रक्रिया स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ी। इसके बावजूद, अंकिता भंडारी हत्याकांड कांग्रेस के लिए एक बड़ा नैरेटिव बन चुका है, जिसे वह महिला सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और सत्ता के दुरुपयोग के मुद्दे से जोड़कर जनता के बीच ले जा रही है।
कांग्रेस की रणनीति स्पष्ट रूप से सरकार विरोधी माहौल को धार देने की है। महंगाई, बेरोज़गारी, भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताएँ, पहाड़ों से पलायन, स्वास्थ्य व शिक्षा व्यवस्था की स्थिति, अंकिता भंडारी हत्याकांड और बुलडोजर कार्रवाई जैसे विषयों को जोड़कर कांग्रेस भाजपा सरकार को कटघरे में खड़ा कर रही है। पार्टी का प्रयास है कि वह इन मुद्दों को केवल राजनीतिक आरोप न रहने दे, बल्कि इन्हें जनभावनाओं से जोड़कर एक व्यापक आंदोलन का रूप दे।
हालाँकि, कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसका आंतरिक संगठन और नेतृत्व की विश्वसनीयता है। पिछले चुनावों में गुटबाज़ी, स्पष्ट नेतृत्व के अभाव और कमजोर जमीनी तैयारी ने पार्टी की संभावनाओं को कमजोर किया था। यदि 2027 से पहले कांग्रेस इन कमजोरियों पर काबू पाकर एकजुट नेतृत्व, मजबूत संगठन और स्पष्ट वैकल्पिक एजेंडा प्रस्तुत करने में सफल होती है, तो सत्ता परिवर्तन की संभावना वास्तविक हो सकती है।
भाजपा के लिए भी राह आसान नहीं है। लंबे समय तक सत्ता में रहने से एंटी-इनकम्बेंसी, स्थानीय असंतोष, बेरोज़गार युवाओं की नाराज़गी और संवेदनशील मामलों पर उठते सवाल पार्टी के सामने चुनौती बने हुए हैं। यदि इन मुद्दों का प्रभावी समाधान और संवाद नहीं किया गया, तो कांग्रेस को इसका राजनीतिक लाभ मिल सकता है।
कुल मिलाकर, उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 एक कड़ा और बहुआयामी मुकाबला बनने जा रहा है। भाजपा विकास, सख्त शासन और स्थिरता के एजेंडे के साथ मैदान में है, जबकि कांग्रेस न्याय, जवाबदेही और जनहित के मुद्दों को लेकर सत्ता को चुनौती दे रही है। अंतिम फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि जनता किसे अधिक भरोसेमंद मानती है—सत्ता की निरंतरता को या बदलाव की संभावना को। इतना तय है कि 2027 तक उत्तराखंड की राजनीति में हर मुद्दा, हर निर्णय और हर कदम चुनावी समीकरणों को गहराई से प्रभावित करेगा।
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