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काशीपुर की राजनीति: सौहार्द और शांति की मिसाल, आपसी सद्भाव हमेशा कायम रहा

@शब्द दूत ब्यूरो (17 जून 2025)

उत्तराखंड के तराई क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक नगर काशीपुर न केवल सांस्कृतिक और औद्योगिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यहां की राजनीति भी एक विशेष पहचान रखती है। देशभर में जहाँ राजनीति अकसर कटुता, वैमनस्य और हिंसा की खबरों के लिए चर्चा में रहती है, वहीं काशीपुर की राजनीति ने वर्षों से एक अलग परंपरा और गरिमा को बनाए रखा है—जो इसे उत्तराखंड की राजनीति में एक आदर्श बनाती है। स्व नारायण दत्त तिवारी, स्व सत्येन्द्र चन्द्र गुड़िया, स्व मुकेश मेहरोत्रा के दौर की राजनीति की शुचिता को आज भी कायम रखने वालों में पूर्व विधायक राजीव अग्रवाल, पूर्व विधायक हरभजन सिंह चीमा, महापौर दीपक बाली ये सभी प्रमुख चेहरे हैं जिन पर इस बात के लिए गर्व किया जा सकता है।

काशीपुर की राजनीतिक पृष्ठभूमि देखें तो यहाँ सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के बीच वैचारिक मतभेद तो सदैव रहे, किंतु कभी भी वह वैमनस्य या व्यक्तिगत शत्रुता में नहीं बदले। यह अपने आप में एक मिसाल है कि जब पूरा देश या राज्य राजनीतिक विद्वेष, रंजिश और हमलों की घटनाओं से प्रभावित रहा, तब भी काशीपुर की राजनीतिक संस्कृति में ऐसी घटनाओं का नामलेवा तक नहीं मिला।

यहाँ चुनावी समर में आरोप-प्रत्यारोप ज़रूर होते हैं। चुनावी मंचों से तीखी बयानबाजी भी सुनने को मिलती है, लेकिन यह लड़ाई केवल विचारों की होती है, व्यक्तियों की नहीं। चुनाव खत्म होते ही नेता एक-दूसरे से मिलते हैं, मुस्कराते हैं, चाय पर चर्चा करते हैं और आपसी संबंधों में कोई कटुता नहीं आने देते।

कई राज्यों और जिलों में दलगत राजनीति इतनी कटु हो जाती है कि कार्यकर्ता एक-दूसरे के खून के प्यासे बन जाते हैं। लेकिन काशीपुर में यह परिपाटी नहीं रही। किसी भी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता हो, वह विरोधी पार्टी के कार्यकर्ता के साथ व्यक्तिगत संबंधों को सहेज कर चलता है। यही कारण है कि काशीपुर में कभी भी किसी पार्टी कार्यकर्ता पर राजनीतिक रंजिश के तहत कोई जानलेवा हमला या गंभीर हिंसा की खबर सामने नहीं आई। एक दो अपवाद जरूर हो सकते हैं।

काशीपुर में चाहे कांग्रेस का समय रहा हो, भाजपा का या अन्य दलों का, सभी बड़े नेताओं ने एक-दूसरे के सम्मान का ध्यान रखा है। चुनाव के समय मंचों पर भले ही कटाक्ष होते हों, किंतु मंच के नीचे या आम जीवन में वे एक-दूसरे को आदर की दृष्टि से देखते हैं। वरिष्ठ नेताओं के प्रति सभी दलों के युवा कार्यकर्ता भी आदर भाव रखते हैं। यही कारण है कि यहाँ कोई भी बड़ा नेता दूसरे को नीचा दिखाने के लिए व्यक्तिगत हमले का सहारा नहीं लेता।

काशीपुर बहु-धार्मिक, बहु-सांस्कृतिक और विविध समुदायों का शहर है। यहाँ का सामाजिक ताना-बाना इतना सुदृढ़ और समरसतापूर्ण है कि राजनेताओं को भी अपनी राजनीति की दिशा और भाषा को उस अनुरूप बनाना पड़ता है। यह सामाजिक दबाव और परंपरा ही है, जो राजनीतिक कटुता को सीमित करती है और सौहार्दपूर्ण राजनीति को प्रोत्साहित करती है।

यह भी उल्लेखनीय है कि काशीपुर के पत्रकार और मीडिया समूह भी राजनीति में सुलझे हुए दृष्टिकोण को बढ़ावा देते आए हैं। यहाँ की पत्रकारिता ने कभी भी आग में घी डालने का काम नहीं किया। साथ ही, काशीपुर की जनता भी किसी भी उग्र राजनीतिक गतिविधि को आसानी से स्वीकार नहीं करती। जनमानस का रुझान हमेशा से विवेकशील और मर्यादित राजनीति की ओर रहा है।

आज जब सोशल मीडिया और तीव्र प्रचार माध्यमों के चलते राजनीति में ध्रुवीकरण और कटुता बढ़ रही है, काशीपुर की राजनीति एक आदर्श प्रस्तुत करती है। यहाँ की राजनीतिक संस्कृति युवाओं को यह सिखाती है कि विचारों की लड़ाई लड़ी जा सकती है, लेकिन मानवीय गरिमा को ठेस पहुँचाए बिना।

काशीपुर की राजनीति, जिस पर वर्षों से न तो कोई हिंसात्मक छाया पड़ी है और न ही किसी तरह की वैमनस्य की कालिमा, वास्तव में एक आदर्श राजनैतिक संस्कृति का प्रतीक है। यहाँ मतभेद हैं, लेकिन मनभेद नहीं। आरोप हैं, पर द्वेष नहीं। विचारों की विविधता है, परंतु संबंधों में मधुरता भी है। यही वह संतुलन है, जिसने काशीपुर की राजनीति को स्थायित्व, सौहार्द और विश्वास का पर्याय बना दिया है।

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