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काशीपुर मेयर का रण: मस्त चाल से चलता बसपा का”हाथी” भाजपा कांग्रेस के लिए खड़ी कर सकता है मुश्किलें

@शब्द दूत ब्यूरो (07 जनवरी 2024)

काशीपुर। मेयर बनने के चुनावी शतरंज की बिसात बिछ चुकी है। कांग्रेस और भाजपा में आमने-सामने की शह और मात की लड़ाईं जोरों पर है। लेकिन इस चुनावी शतरंज के एक खिलाड़ी को नजरंदाज किया जा रहा है। बहुजन समाज पार्टी के हसीन खान इस चुनावी शतरंज में अपनी चालें चल रहे हैं।

हसीन खान बहुजन समाज पार्टी से मेयर के योद्धा हैं। 2008 के चुनावी रण में जब शमसुद्दीन बहुजन समाज पार्टी से उम्मीदवार थे तब भी कमोबेश यही स्थिति थी। और उस समय शमसुद्दीन को नजरंदाज करना कांग्रेस और भाजपा दोनों पर ही भारी पड़ गया था। क्या इस चुनाव में ऐसी कुछ संभावना है?  चुनाव में किसी भी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। दलित और मुस्लिम मतों पर बसपा की पकड़ मानी जाती है। इस चुनाव में हसीन खान को नजरंदाज कर जिस तरह से भाजपा कांग्रेस आमने-सामने की लड़ाईं लड़ रहे हैं वह सभी देख रहे हैं।

हसीन खान का चुनाव प्रचार फिलहाल भाजपा कांग्रेस की तरह मुखर होकर सामने नहीं आ पा रहा है। ऐसे में यह बसपा की रणनीति हो सकती है। हसीन खान खामोशी के साथ अपने समर्थकों के साथ इस रण में खामोश योद्धा की तरह चल रहे हैं। दलित और मुस्लिम मतों की चुप्पी भी अपने आप में बहुत कुछ कह रही है। उधर हसीन खान का हाथी चुनाव चिन्ह गली कूचों से धीरे-धीरे घरों तक पहुंच रहा है और यही भाजपा कांग्रेस भुला रहे हैं।

खासकर मुस्लिम मतों वाले इलाके में हसीन खान का चुनाव प्रचार जोर पकड़ रहा है। दलित वोट बैंक बसपा के पास है। एक खास बात यह है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियों के प्रत्याशियों के बीच अभी मुकाबला बराबरी का दिख रहा है। दोनों में से किसी एक को स्पष्ट बढ़त की स्थिति नहीं नजर आ रही है। हालांकि भाजपा की ओर से दावे जरूर किये जा रहे हैं और सत्तारूढ़ होने के साथ साथ मोदी फैक्टर जरूर भाजपा के पक्ष में है। उधर कांग्रेस प्रत्याशी और उनके समर्थकों की ओर से भी दावे हैं कि इस बार कांग्रेस का सूखा समाप्त होने जा रहा है। कुल मिलाकर दोनों ही अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है। पर चुनाव में ओवर कांफिडेंस की भावना नुकसान का घर भी दिखा देती है।

ऐसे में हसीन खान का खामोश प्रचार दोनों के लिए ही खतरा बन सकता है। हालांकि राजनीतिक समीक्षा की दृष्टि से देखा जाए तो हसीन खान कांग्रेस को नुक़सान पहुंचा सकते हैं। अधिकांशतः भाजपा समर्थक यह मानते हैं लेकिन कहीं ऐसा न हो कि कांग्रेस के साथ भाजपा को भी नुकसान न झेलना पड़ जाय‌ । और ऐसा हुआ है 2008 को याद करना जरूरी है।

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