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काशीपुर मेयर का रण :क्या एंटी इन्कंबेंसी फैक्टर और भीतरघात पर निर्भर करेगा परिणाम?

@शब्द दूत ब्यूरो (04 जनवरी 2024)

काशीपुर । चुनावों में एंटी इन्कंबेंसी फैक्टर यानी सत्ता विरोधी लहर का दौर भले ही आजकल बेमानी साबित हो रहा है। लेकिन काशीपुर नगर निगम चुनाव में इस बार एंटी इन्कंबेंसी फैक्टर की बड़ी भूमिका होने जा रही है।

हालांकि पिछले कुछ चुनावों में ऐसा नहीं हुआ है पर इस बार होगा। पिछले कई सालों से काशीपुर नगर निगम के मेयर पद पर भाजपा काबिज रही है। शहर की समस्याओं की अगर बात करें तो वह जस की तस मुंह बाये खड़ी हैं। हर बार सत्ता में होने और सत्तारूढ़ दल के प्रत्याशी को मेयर पद का चुनाव जिताने के लिए तर्क दिया जाता है कि केंद्र और प्रदेश  में जिस दल की सरकार होगी उसी के प्रत्याशी को मेयर पद पर जिताना चाहिए ताकि शहर के विकास में कोई कमी न हो सके। कांग्रेस की ओर से पूर्ववर्ती मेयर जो कि भाजपा से ही रहे के कार्यकाल में शहरवासियों की समस्याओं के हल न होने का तर्क दिया जा रहा है। ऐसे में जनता कहाँ तक कांग्रेस के इस तर्क से सहमत होगी इसी पर काशीपुर के मेयर पद का परिणाम निर्भर करेगा।

यहाँ भाजपा के मेयर प्रत्याशी दीपक बाली आम नेताओं से अलग छवि रखते हैं। एंटी इन्कंबेंसी फैक्टर की काट के लिए उनका अब तक का राजनीतिक इतिहास बताता है कि वह जनता के चहेते नेता के रूप में जाने जाते हैं। ऐसे में एंटी इन्कंबेंसी फैक्टर कितना प्रभाव हो पायेगा ये भविष्य के गर्भ में है। दरअसल शब्द दूत ने तमाम लोगों से आन कैमरा और आफ कैमरा बात की। भाजपा के समर्थक भी मानते हैं कि शहर में तमाम समस्यायें हैं जो बार बार नेताओं के दावों के बावजूद हल नहीं हो पायी हैं तो विरोधी यानि कांग्रेस तो इन समस्याओं की जननी भाजपा को ही मानती है। मतलब समस्याओं को लेकर चाहे भाजपा के समर्थक हों चाहें कांग्रेस के समर्थक एक राय रखते हैं।

दीपक बाली इन समस्याओं के निदान का किस हद तक जनता को भरोसा दिला पाते हैं और कांग्रेस के संदीप सहगल इन समस्याओं को लेकर कितना भाजपा को नुकसान पहुंचा पाते हैं यह देखना भी दिलचस्प होगा।

एक खास बात तो हर राजनीतिक दल को झेलनी पड़ती है और वह है भीतरघात। दोनों ही दलों में भीतरघात की बड़ी संभावनायें बनी हुई है। भाजपा के दिग्गज नेता टिकट चयन पर चुप्पी साधे हुए हैं और चुनाव प्रचार में वह नजर नहीं आ रहे। कमोबेश यही स्थिति कांग्रेस की भी है। भीतरघात किस दल को कितना नुकसान पहुंचा सकती है या मतदान की तिथि नजदीक आते आते रूठे नेता मैदान में खुलकर सामने आ सकते हैं? इस बात की संभावना कम ही नजर आ रही है।

भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों ने इस बार ऐसे चेहरों को मैदान में उतारा है जिन पर राजनीतिक रूप से कोई विवाद नहीं है सिर्फ इतना कि उनक अअपनी ही पार्टी के नेता भीतर ही भीतर नाराज हैं लेकिन खुलकर सामने नहीं आ रहे। आपको याद दिला दें कि बीते विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण को खुलेआम सार्वजनिक रूप से विरोध दर्शाने के बाद उन नेताओं ने कदम पीछे खींच लिये थे। पर मेयर चुनाव में भीतरघाती नेताओं की चुप्पी कुछ ज्यादा खतरे का संकेत दे रही है। अब वो चाहें भाजपा हो या कांग्रेस। पिछली बार मेयर चुनाव में कांग्रेस की ओर से भी खुलकर विरोध किया गया था।

फिलहाल एंटी इन्कंबेंसी फैक्टर और भीतरघात काशीपुर मेयर चुनाव में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने जा रहा है।

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