
वरिष्ठ पत्रकार जाने माने आलोचक
‘वेस्टर्न डिस्टर्बेंस ‘मौसम विज्ञान के लिए प्रचलित शब्द है।इसका मतलब मौसम में गड़बड़ी का होना है। हिन्दी वाले इसे पश्चिमी विक्षोभ कहते हैं।जब ‘जब पश्चिम से विक्षोभ उत्पन्न होता है, बड़ा कष्टदायक होता है। फसलें चौपट हो जाती हैं। बीमारियों की बाढ़ आ जाती है।
आजकल यही वेस्टर्न डिस्टर्बेंस यानि पश्चिमी विक्षोभ सियासत में भी असर दिखाने लगा है। राजस्थान में चुरू के मौजूदा सांसद अपना टिकट कटते ही विक्षोभ से भर गये हैं। उन्होंने पार्टी के सुप्रीम नेताओं के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद कर दिया है। चुरू के सांसद भाजपा के राहुल कास्वां हैं।वे अपना टिकट कटने की वजह जानना चाहते हैं लेकिन उनका फोन उठाने को कोई तैयार नहीं है।न पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा,न केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और न परम श्रद्धेय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी।
जब किसी ने कास्वां का फोन नहीं उठाया तो उन्होंने खुद बगावत का झंडा उठा लिया और इन अफवाहों को निर्मूल साबित कर दिया कि भारतीय जनता पार्टी में सब कायर है। चुरू की बगावत ने मोदी -शाह की जोड़ी को आइना दिखाया है।अब आने वाले दिनों में भाजपा में अनेक कास्वां मोर्चे पर खड़े दिखाई दे सकते हैं।
भाजपा के सुप्रीम नेताओं ने पिछले आम चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के भांजे अनूप मिश्रा को घर बैठा दिया था। अनूप मिश्रा मुरैना से सांसद थे।उनका टिकट काटकर 2019 में नरेन्द्र सिंह तोमर को टिकट दे दिया गया था। मिश्रा जी खून का घूंट पीकर रह गये, लेकिन जब पिछले साल उन्हें विधानसभा चुनाव का टिकट भी नहीं दिया, तो उनका गुस्सा भी देखने लायक है। मिश्रा जी सुना है कांग्रेस के टिकट पर ग्वालियर सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए कमर कस चुके हैं।
चुरू और ग्वालियर से उठी बगावत की ये चिंगारियां भाजपा के मिशन 370 में पलीता लगा सकतीं हैं। भाजपा में अब ऐसा कोई महाबली नहीं है जो इस असंतोष को नियंत्रित कर सके। असंतोष ने, बगावत ने भाजपा का घर देख लिया है। भाजपा की दूसरी सूची आने पर ये असंतोष और बगावत ज्यादा तीव्र हो सकती है। भाजपा में असंतोष अभी तक सतह पर नहीं था, लेकिन अब आ गया है। आने वाले दिनों में मुमकिन है कि आप सियासत के वेस्टर्न डिस्टर्बेंस का असर दूर – दूर तक देखें।
भाजपा के भाग्यविधाता जानते हैं कि पार्टी के अनुशासन में पलीता लग चुका है। इसीलिए भाजपा अब चंद्रबाबू नायडू और नवीन पटनायक को ही नहीं बल्कि अकाली दल को भी साधने में लगी है। उत्तर प्रदेश में इसी वजह से भाजपा को मुट्ठीभर वोट लेकर घूमने वाले राजभर को मंत्री बनाना पड़ा। यानि अब भाजपा में ‘ मजबूरी का नाम महात्मा गांधी ‘ नहीं बल्कि ‘ मजबूरी और कथित मजबूती का नाम मोदी – शाह हो गया है। परिवार वाद के खिलाफ अखंड लड़ाई लड़ने वाले प्रधानमंत्री जी को अब अपना ‘ मोदी परिवार ‘ बनाना पड़ा है।
लोकसभा चुनाव से पहले बगावत और असंतोष का ज्वार – भाटा आकर जा चुका है। भाजपा में इसकी अभी शुरुआत हुई है। जितने कांग्रेसियों को भाजपा के शरणार्थी शिविरों में आना था वे आ चुके हैं।अब बारी भाजपा की है। भाजपा में टिकट वितरण से नाखुश नेता कांग्रेस के शरणार्थी शिविरों में आने के लिए आतुर हैं। मप्र और राजस्थान से इसका श्रीगणेश हो चुका है। भाजपा नेताओं के दिलों से मोदी शाह का खौफ निकल है। कांग्रेस से तो भयभीत नेता पहले ही भाजपा में चले गए।अब उनका भविष्य क्या होगा, भगवान जाने !
गौरतलब है कि पिछले एक दशक में भाजपा का आंतरिक लोकतंत्र जहां क्षीण हुआ है वहीं कांग्रेस का आंतरिक लोकतंत्र मजबूत हुआ है। कांग्रेस में युवा पीढ़ी के अनुशासन से खिन्न तमाम नेता कांग्रेस छोड़कर या तो भाजपा में शामिल हो गए या फिर उन्होंने अपनी पार्टी बना ली। कुछ समाजवादी पार्टी के बगलगीर बन गए। इसके बरक्स भाजपा में नेतृत्व से असहमत नेता पार्टी में ही घुट घुटकर जी रहे हैं। उनमें बगावत का साहस नहीं है।वे ईडी, सीबीआई की जद में आने और जेल जाने से डरते हैं और ठकुरसुहाती करने पर विवश हैं।
लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अब भाजपा में भी कुछ लोगों की आत्मा जागृत हुई है। चुरू का विद्रोह इस बात का द्योतक है। ग्वालियर इसी रास्ते पर आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। भाजपा में हिटलरशाही के खिलाफ ये एक शुभ संकेत है। भाजपा का पिछले कुछ सालों में जिस गति से कांग्रेसीकरण हुआ है उससे भाजपा का संघ दीक्षित कार्यकर्ता क्षुब्ध है। खासतौर पर महाराष्ट्र और मप्र का भाजपा संगठन कांग्रेसीकरण का शिकार बना है।
अब देखना ये है कि मोदी और शाह की जोड़ी पार्टी में पैदा हो रहे असंतोष और बगावत के वेस्टर्न डिस्टर्बेंस से खुद को बचा पाएगी या नहीं ?
@ राकेश अचल
Shabddoot – शब्द दूत Online News Portal