@शब्द दूत ब्यूरो (13 जनवरी 2024)
काशीपुर। चामुंडा मंदिर परिसर में उत्तरायणी मकर संक्रांति मेला समिति द्वारा आयोजित किए जाने वाले उत्तरायणी मेले की सभी तैयारियां पूरी हो चुकी है। विगत 27 वर्षों से इस मेले का आयोजन किया जा रहा है। कुमाऊनी व अन्य क्षेत्रीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों व नृत्य के चलते इस मेले की काफी लोकप्रियता है।
मेला संयोजक सुनील टंडन ने बताया कि मेला प्रत्येक वर्ष 14 जनवरी को मनाया जाता है। शहर के सभी वर्गों के लोगों का मेला समिति को भरपूर सहयोग मिलता रहा है। मेले में भ कुमाऊं के पारंपरिक लोक नृत्य छोलिया एक विशेष आकर्षण का केंद्र है। अल्मोड़ा की भुवन राम एंड पार्टी के द्वारा प्रतिवर्ष इस मेले में आकर मेले की शोभा बढ़ायी जाती है।
आज छोलिया नर्तकों की टीम शहर में पहुंच कर सर्वप्रथम परंपरा के अनुसार मेले के मुख्य यजमान भाजपा नेता दीपक बाली के निवास पर पहुंचीं जहां उनकी धर्मपत्नी उर्वशी बाली तथा पुत्री मुद्रा बाली ने उनका स्वागत किया। बाद में छोलिया नर्तकों की टीम मौहल्ला किला से शहर के मुख्य बाजार से नृत्य करती हुई उत्तरायणी मेला यजमान पंकज टंडन के निवास पर पहुंचीं जहां उनका स्वागत किया गया। मुख्य बाजार से होते हुए मेला संयोजक सुनील टंडन के प्रतिष्ठान पर पहुंची। जहां से मुख्य चौराहे से होकर चामुंडा मंदिर परिसर पहुंचे।
जानिये छोलिया नृत्य के बारे में
छोलिया या सरौं ऐसा नृत्य है, जिसकी शुरुआत सैकड़ों वर्ष पूर्व की मानी जाती है। इतिहासकारों के अनुसार मूलरूप में कुमाऊं अंचल का यह प्रसिद्ध नृत्य पीढ़ियों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान रहा है। छोलिया नृत्य की विशेषता यह है कि इसमें एक साथ श्रृंगार और वीर रस, दोनों के दर्शन हो जाते हैं। हालांकि, कुछ लोग इसे युद्ध में जीत के बाद किया जाने वाला नृत्य तो कुछ तलवार की नोकपर शादी करने वाले राजाओं के शासन की उत्पत्ति का सबूत मानते हैं।
छोलिया नृत्य में ढोल-दमाऊ की अहम भूमिका होती है। इसके अलावा इसमें नगाड़ा, मसकबीन, कैंसाल, भंकोरा और रणसिंघा जैसे वाद्य यंत्रों का भी इसमें इस्तेमाल होता है। छोलिया नृत्य करने वाले पुरुषों की वेशभूषा में चूड़ीदार पैजामा, एक लंबा-सा घेरदार छोला यानी कुर्ता और छोला के ऊपर पहनी जाते वाली बेल्ट कमाल की लगती है। इसके अलावा सिर में पगड़ी, कानों में बालियां, पैरों में घुंघरू की पट्टियां और चेहरे पर चंदन और सिंदूर लगे होने से पुरुषों का एक अलग ही अवतार दिखता है। बरात के घर से निकलने पर नर्तक रंग-बिरंगी पोशाक में तलवार और ढाल के साथ आगे-आगे नृत्य करते चलते हैं। नृत्य दुल्हन के घर पहुंचने तक जारी रहता है। बरात के साथ तुरही या रणसिंघा भी होता है।
छोलिया नृत्य के दौरान नर्तकों की भाव-भंगिमा में ‘छल’ दिखाया जाता है। नर्तक अपने हाव-भाव से एक-दूसरे को छेड़ते हैं और चिढ़ाने व उकसाने के भाव प्रस्तुत करते हैं। इसके अलावा डर और खुशी के भाव भी नृत्य में झलकते हैं। इस दौरान जब आस-पास मौजूद लोग रुपये उछालते हैं तो छोल्यार उन्हें तलवार की नोक से उठाते हैं। खास बात ये कि छोल्यार एक-दूसरे को उलझाकर बड़ी चालाकी से रुपये उठाने की कोशिश करते हैं। यह दृश्य देखने में बड़ा आकर्षक लगता है
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