@शब्द दूत ब्यूरो( 25 मई 2023)
अपनी भाषा अपनी बोली गर्व का अहसास कराती है। लेकिन इधर खास तौर पर पर्वतीय क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषा धीरे धीरे आने वाली पीढ़ी भूलने जा रही है।
उत्तराखंड में बोली जाने वाली भाषा यहां की सांस्कृतिक पहचान और विरासत है लेकिन क्या हम आने वाली पीढ़ियों तक इस भाषा के अस्तित्व को बचाए रख पाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। जबाब है,बिल्कुल नहीं।
अन्य प्रदेशों की क्षेत्रीय भाषा और बोलियों को लेकर वहां के लोग सजग है। पर इसके विपरीत पर्वतीय क्षेत्रों से मैदानी क्षेत्र में आ चुके लोग अपनी भाषा से दूर होते जा रहे हैं। खास तौर पर नयी और युवा पीढ़ी तो कुमाऊं या गढ़वाल की परंपरागत बोली न तो बोल पाती है और न समझ पाती है। ऐसे इक्का दुक्का उदाहरण मिलेंगे जहां आप आज की युवा पीढ़ी को अपनी भाषा बोली में संवाद करते पायेंगे।
पहाड़ से मैदान आकर हमने रोजगार पाया यहां तक कि समृद्धि भी हासिल की लेकिन इसके लिए हम बहुत कुछ खो रहे हैं। अपनी संस्कृति और अपनी विरासत को बचाएं रखने के लिए सबसे पहली शर्त यही है कि हम अपनी पारंपरिक बोली को भी जीवित रखें।
इसी विषय को लेकर यह कार्टून फिल्म बनी है। फिल्म छोटी जरूर है पर इस फिल्म का उद्देश्य विशाल है। इस फिल्म के जरिए अपनी भाषा को न भूलने का एक छोटा सा प्रयास किया गया है। फिल्म देखने में आपको ज्यादा समय नहीं लगेगा। फिल्म देखकर सोचियेगा जरूर।
Shabddoot – शब्द दूत Online News Portal