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पत्रकारिता के बदलते मानदंड -1: लक्ष्य पर या लक्ष्य से भटका रही है मीडिया, वरिष्ठ पत्रकार सुरेश शर्मा की कलम बोलती है

पत्रकारिता के बदलते मानदंड:

आज से एक नयी श्रृंखला शुरू कर रहा है शब्द दूत। वर्तमान दौर की पत्रकारिता  और बीते समय का स्वर्णिम दौर। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश शर्मा इस श्रृंखला में बतायेंगे कुछ ऐसा जो कि वर्तमान पत्रकारों के लिए मील का पत्थर साबित होगा।

देश की आजादी की लड़ाई में भारतीय प्रेस ने एक अहम भूमिका निभाई थी। उस समय पत्रकारिता करने वालों के सामने एक ही लक्ष्य था और उस लक्ष्य की पूर्ति के लिए वे बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तत्पर रहते थे। तभी तो उस समय के आदर्श पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी और पराड़कर जी का नाम लेकर हम आज भी आदर्श पत्रकारिता की कल्पना करते है । और उनके अनुयायी बनने की शिक्षा आज के पत्रकारों को भी देते है । आज की पत्रकारिता और पत्रकारों का स्वरूप आजादी से पहले के पत्रकारों जैसा नही रहा है । उस समय तब के पत्रकारिता में लगे लोगों का चिंतन मनन और आचरण अपने मिशन के लिए समर्पित था ।

उस दौर में समाचार पत्र केवल पाठकों के बल पर चलते थे अब समाचार पत्र सरकार की कृपा से चलते है। समाचार पत्रों और उनमें लगे पत्रकारों को सरकार का मुंह ताकना पड़ता है क्योंकि विज्ञापन और कागज का कोटा उनसे ही मिलता था। सूचना विभाग और कुछ सम्बंधित विभागों को भेजने के लिए मात्र 100-200 प्रतियां छाप कर ही भेजने से ही काम चल जाता है। करीब लाखों की संख्या में इसी तरह छप रहे दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक पत्र पत्रिकाओं का नाम और काम इसी तरह चल रहा है और समाज में उनकी पत्रकारिता की धाक बनी हुई है।(जारी…..)

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