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दर्दनाक : काशीपुर में हरीतकी की धीरे धीरे हो रही मौत,कौन है दोषी? संस्कृत विद्यालय के पूर्व प्रधानाचार्य बता रहे पूरी कहानी, देखिए वीडियो

@शब्द दूत ब्यूरो (17मार्च 2023)

काशीपुर। शीर्षक देखकर आप चौंक गए होंगे। लेकिन ये सच है। वृक्ष भी सजीव होते हैं। और वृक्ष भी ऐसे जिनका धार्मिक और औषधीय महत्व है।

काशीपुर के धार्मिक और पौराणिक स्थल गिरीताल परिसर में स्थित हरड़ के दो वृक्षों की धीरे धीरे मौत हो रही है। वृक्षों की यह दशा देखकर संस्कृत विद्यालय के सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य परमानंद डूगराकोटी आहत हैं। उन्होंने अपनी व्यथा को व्यक्त करते हुए कहा कि हरड़ यानि हरीतिका जिसे मातृ वृक्ष भी कहा जाता है। इन्हें पिछले एक दो साल से सुखाने की साज़िश की जा रही है। इन वृक्षों को सुखाने के लिए दोनों वृक्ष के आसपास गहरे गड्ढे खोदकर उनमें चूने के कट्टे डाल दिये गये हैं ताकि जड़ सूख जाय और धीरे-धीरे हरड यानी हरीतिका के इन वृक्षों की मौत हो जाये।

आचार्य परमानंद डूंगराकोटी ने इस वृक्ष की महत्ता बताई। ह आयुर्वेद में इसे प्राणदा, अमृता, कायस्था, विजया, मध्या आदि नामों से जाना जाता है। हरड़ का पेड़ 60 से 80 फुट ऊंचा होता है।

उन्होंने बताया कि आयुर्वेद में हरड़ को त्रिदोष (कफ, पित्त ,वात) नाशक माना जाता है। इसकी चटनी का सेवन करने से बुद्धि, बल और आयु में वृद्धि होती है। भोजन के अंत में हरड़ का सेवन करने से वात, कफ व पित्त से उत्पन्न विकार शांत हो जाते हैं। हरड़ को नमक के साथ मिलाकर खाने से कफ (बलगम) का नाश होता है। इसका सेवन खांड के साथ करने से पित्त स्थिर रहता है। हरड़ को घी और गुड़ के साथ खाने से सभी प्रकार की बीमारियां में आराम लगता है। साथ ही इसका प्रयोग सौन्दर्य के लिए भी काफी लाभप्रद होता ह़ै।

आचार्य परमानंद डूंगराकोटी कहते हैं कि शासन प्रशासन को इन वृक्षों की रक्षा के लिए समुचित प्रबंध करने चाहिए ताकि औषधीय गुणों से भरपूर हरड़ वृक्षों का जनसाधारण को लाभ मिल सके।

बहरहाल यह सवाल अभी भी अंधेरे में है कि आखिर कौन लोग हैं जो इन हरीतिका के वृक्षों की हत्या करने की साज़िश रच रहे हैं। कौन हैं जिसने आठ से दस फुट का गढ्डा खोद डाला।इस गड्डे में कोई भी गिर सकता है वह जानवर या कोई व्यक्ति भी हो सकता है।

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