उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को लेकर कयासों के बाजार गर्म हैं। खुद मुख्यमंत्री अपने विरोधियों को लेकर मुखर रहते हैं। लेकिन उनके इर्द-गिर्द ऐसे सलाहकारों का जाल बिछा है जो उन्हें वस्तु स्थिति से अवगत कराने के बजाय उनकी जयजयकार में जुटे हैं। ऐसे सलाहकार राज्य भर में बिखरे पड़े हैं। दरअसल इन चापलूस सलाहकारों की वजह से ही गाहे-बगाहे मुख्यमंत्री के विरोध में माहौल बन रहा है।
कई तथाकथित सलाहकार तो ऐसे हैं कि उनकी वजह से वहाँ के सच्चे और निष्ठावान कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर दिया गया है। यहाँ तक कि स्थानीय विधायक की राय को भी तवज्जो नहीं दी जा रही। कहावत है कि सौ चापलूसों पर विद्वान आलोचक भारी पड़ता है। पद की लालसा में लगे लोग सत्ता के प्रति गलत माहौल पैदा कर देते हैं। और वही मुख्यमंत्री के खिलाफ माहौल बनाने में मददगार साबित हो रहे हैं।
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत राज्य की स्थिति सुधारने और पार्टी की प्रतिष्ठा संवारने का भरसक प्रयास कर रहे हैं। मुख्यमंत्री कोई भी हो। वह राज्य की जनता के प्रति जबाबदेह होता है। राज्य में कहीं कहीं तो ऐसे लोगों का काकस है जो विधानसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशियों के विरोध में मुखर रहे थे। वही राज्य में भाजपा सरकार बनने के बाद खुद को पार्टी का निष्ठावान सिपाही साबित करने का प्रयास कर रहे हैं। वैसे मुख्यमंत्री एक बार स्वयं कह चुके हैं कि उन्हें अपने ही लोग नुकसान पहुंचाने में जुटे हैं। हालांकि यह बात स्वयं कहने के बावजूद मुख्यमंत्री क्या उन लोगों को पहचान नहीं पाये।
तमाम भाजपा के कार्यकर्ताओं ने कई बार कहा है कि 2022 का चुनाव जीत पाना इन परिस्थितियों में मुमकिन नहीं है। अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं की इस राय को मुख्यमंत्री महत्वपूर्ण नहीं मान रहे हैं या उनके सामने वास्तविक तस्वीर नहीं पेश की जा रही है? वैसे वास्तविक तस्वीर पेश करने वाला कार्यकर्ता विद्रोही मान लिया जाता है। जबकि देखा जाए तो पार्टी का असली निष्ठावान कार्यकर्ता वही है। समय रहते अपने इर्द-गिर्द के काकस को पहचान कर उन्हें चिन्हित कर उनसे सावधान रहना होगा। 



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