@शब्द दूत ब्यूरो (19 मार्च 2026)
देहरादून/नैनीताल। माननीय उच्च न्यायालय ने अनूप अग्रवाल द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए कड़ी फटकार लगाई है। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पुलिस विवेचना में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है।
याचिकाकर्ता अनूप अग्रवाल ने अपने खिलाफ दर्ज पांच मुकदमों में राहत की मांग करते हुए सभी मामलों की जांच सीबीआई या अन्य एजेंसी को स्थानांतरित करने, एफआईआर को अवैधानिक घोषित करने तथा उन्हें निरस्त (क्वैश) करने की अपील की थी।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि याचिका में उठाए गए तर्क भ्रमात्मक, अंतर्विरोधी और अस्पष्ट हैं। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि दो मामलों में आरोप पत्र पहले ही दाखिल किया जा चुका है, जबकि अन्य मामलों की विवेचना जारी है।
न्यायालय ने इस बात पर विशेष नाराजगी जताई कि याचिकाकर्ता ने अदालत से मिली प्रोटेक्शन का दुरुपयोग किया। बताया गया कि अनूप अग्रवाल 10–15 लोगों के समूह, जिसमें 10–12 अधिवक्ता और एक वर्तमान विधायक शामिल थे, के साथ कोतवाली पहुंचे और विवेचक के समक्ष सामूहिक रूप से कथन दर्ज कराने का प्रयास किया।
कोर्ट ने इस कृत्य को पूरी तरह अनुचित बताते हुए कहा कि इस तरह की गतिविधियां विवेचना प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास हैं, जिसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उच्च न्यायालय ने याचिका को खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता को कड़ी चेतावनी दी।
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