@विनोद भगत
काशीपुर का गोविषाण टीला एक बार फिर चर्चा में है। समय समय पर तेंदुए के पिंजरे में फंसने को वन विभाग ने अपनी बड़ी सफलता के रूप में पेश किया जाता रहा है । तस्वीरें जारी होती हैं। बयान आए, और राहत की सांस ली गई कि संभावित खतरा टल गया।
लेकिन इस “कामयाबी” के पीछे एक बड़ी नाकामयाबी भी छुपी है—और वह नाकामयाबी सिर्फ एक विभाग की नहीं, बल्कि उन बड़े-बड़े सरकारी दावों की है जिनमें कहा जाता है कि हम देवभूमि उत्तराखंड के धार्मिक, सांस्कृतिक और पौराणिक स्थलों को विश्व स्तर पर पहचान दिलाएंगे।
पिंजरा सफलता का प्रतीक या विफलता का संकेत?
जब किसी संरक्षित ऐतिहासिक स्थल पर बार-बार तेंदुए की मौजूदगी दर्ज हो, पिंजरे लगाने पड़ें, और फिर उसे पकड़ना “उपलब्धि” बन जाए—तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि समस्या की जड़ क्या है?
करीब 90 एकड़ में फैले इस टीले पर आज स्थिति यह है कि आमजन का प्रवेश सीमित है, झाड़ियां घनी हैं और विभागीय तालमेल कमजोर। ऐसे में जंगली जानवरों के लिए यह क्षेत्र सुरक्षित आश्रय बनता जा रहा है।
तेंदुए का पकड़ा जाना तात्कालिक राहत हो सकती है, लेकिन क्या यह स्थायी समाधान है? या यह उस प्रशासनिक ढांचे की कमजोरी को ढंकने की कोशिश है, जिसने समय रहते समन्वित कार्ययोजना नहीं बनाई?
देवभूमि के दावे बनाम जमीनी सच्चाई
उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। सरकार बार-बार घोषणा करती है कि धार्मिक और पौराणिक स्थलों को वैश्विक पहचान दिलाई जाएगी।
परंतु विडंबना यह है कि काशीपुर जैसे शहर में स्थित गोविषाण टीला—जिसका अपना ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है—उसे शहर के ही अधिकांश लोग विस्तार से नहीं जानते।
विश्व स्तर की पहचान तो दूर, स्थानीय स्तर पर भी न तो पर्याप्त प्रचार-प्रसार है, न व्यवस्थित पर्यटन ढांचा, न ही जन-जागरूकता अभियान।
जब किसी स्थल की पहचान लोगों के मन में नहीं बनती, तो वह धीरे-धीरे उपेक्षा का शिकार हो जाता है। और उपेक्षित स्थान अक्सर समस्याओं की जमीन बन जाते हैं।
जिम्मेदारी से बचने का खेल?
वन विभाग और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के बीच जिम्मेदारी का सवाल पहले से ही चर्चा में है। NOC, अधिकार क्षेत्र और सुरक्षा प्रोटोकॉल की बातें फाइलों में चलती रहती हैं।
लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जब तक समन्वित प्रयास नहीं होंगे, तब तक समस्या दोहराई जाती रहेगी।
यदि किसी दिन कोई बड़ी दुर्घटना हो जाती है, तो क्या तब भी जिम्मेदारी तय करने के लिए बैठकों का इंतजार होगा?
पहचान की कमी ही सबसे बड़ी नाकामयाबी
तेंदुए का पकड़ा जाना घटना है, पर असली मुद्दा है—इस ऐतिहासिक धरोहर की पहचान और संरक्षण की सोच।
- क्या यहां नियमित सांस्कृतिक आयोजन हो सकते हैं?
- क्या इसे नियंत्रित पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है?
- क्या स्थानीय विद्यालयों और युवाओं को इसके इतिहास से जोड़ा जा सकता है?
जब तक इंसानी उपस्थिति संतुलित और व्यवस्थित नहीं होगी, तब तक प्रकृति अपना रास्ता खुद बनाएगी।
पिंजरे में फंसा तेंदुआ वन विभाग की तात्कालिक सफलता हो सकती है, लेकिन वह उस व्यापक विफलता की ओर भी संकेत करता है, जिसमें एक ऐतिहासिक स्थल उपेक्षा और विभागीय असमंजस का शिकार है।
देवभूमि के गौरव की बातें तभी सार्थक होंगी, जब अपने शहर की धरोहर को पहले पहचान और संरक्षण मिले।
वरना विश्व पहचान के दावे कागजों में चमकते रहेंगे, और जमीन पर गोविषाण जैसे स्थल फाइलों और पिंजरों के बीच सिमटे रहेंगे।
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